Tuesday, November 6, 2018

" अब भरोसा नहीं "

ऐक गुलशन मे खिलते थे वो चार गुल 
रंग  जिनके जुदा ओर जुदा जिनकी बु 
फिर भी मेह्काते गुलशन को मिलके वो यूँ
जेसे इक डाल के ही थे चारो वो गुल

अब ये क्या हो गया कुछ समझ ना सके
एक दूजे पर किसी को अब भरोसा नही....

रोज़ सुबह मिल जुल कर चारों गीत सुहाने गाते थे
ऐक अगर मुरझाता था बाकी भी मुरझा जाते थे
ओस की बूंदों  को भी चारो मिलकर बांटा करते थे
तेज़ धूप मे इक दूजे पर मिलकर साया करते थे

अब ये क्या हो गया कुछ समझ ना सके
एक दूजे पर किसी को अब भरोसा नही....

किसी शरारती की हरकत से, ऐक कोई कट जाता था
रंग बदलते थे बाकी के, आँखों में पानी आता था
कटी हुई डाली को बाकी , मिल कर यूं सेहलाते थे
जैसे भाई बहन इक दूजे को , बातों से बेहलाते है

अब ये क्या हो गया कुछ समझ न सके
एक दूजे पर किसी को अब भरोसा नही....

बिखरे हुये बाग़ को आज फिर से चमन बनाना हे 
चडी हुइ ग़ुबार को इसके उपर से हटाना हे
फिर से मिल जुल कर सबकों को गीत सुहाने गाना हे
बुलबुल मेना तितली  को वापस फिर बुलना हे
कोइ नहीं आयेगा आगे फुलो को ही आना है
अपने इस प्यारे गुलशन को  मिलके फिर सजाना हे

जो ये ना सामझ सके अब भी तो.........

राख और खाक़ भी गुलशन की कही मिलेगी नही
क्योंकि...एक दूजे पर किसी को अब भरोसा नही.

Wednesday, October 31, 2018

देख लिया ..

राज़ उनको बता के उल्फत का,


बंद होंटो की मुस्कुराहट को हमने देख लिया।


ख़बर आने की उनके जब भी आई,


ताल्लुक तोड़ के के यारो से हमने देख लिया ।


दो घड़ी के तेरे दीदार की हसरत में,


सर्द रातो में  इंतेज़ार कर के देख लिया ।


आप से दिल्लगी बस मेरी दोस्ती थीं,


उनके इस तीर से दिल अपना छलनी करके देख लिया।


राज़ उनको बता के उल्फत का,


उनकी बेरुख़ी की इंतेहा को हमने देख लिया ।।

"शर"

Thursday, April 6, 2017

Your Eyes

I Lost my memories
forget my world behind
Whenever I looks in your eyes
Time waits and nature listen
All the world turn stand still
Whenever I looks in your eyes
Noise turn to music
Stars start twinkling
Moon enhance its shine
Whenever I looks in your eyes

Thursday, October 1, 2015

सोलह खम्बी

वर्षा ऋतू के बाद अपनी मोटर बाइक से लम्बी यात्रा करना मेरा जूनून है फिर कोई साथ मिला तो ठीक वरना में और मेरी बाइक
पिछले सप्ताह चिडीखो वन अभयारण जाने का विचार बना
चिडीखो में पहले भी जा चुका था , बरसात के बाद वहां के प्राकर्तिक सौंदर्य का बयां सिर्फ चंद वाक्यों में करना मुश्किल है।
वहां पहुचने पे याद आया के वो बुधवार का दिन है और बुधवार को चिडीखो बंद रहता है।
यह बात में पहले से जनता था , अब यह मेरी भूल थी या मेरे भाग्य में किसी नई जगह का भ्रमण लिखा था ।
चिडीखो के मुख्य द्वार पे मुझे एक सज्जन ने बताया के यहाँ से मात्र 3.5 की मी की दूरी पे एक स्थान है वहाँ 10वी शताब्दी का एक ऐतिहासिक स्मारक है और 16वी शताब्दी की एक दरगाह और मस्जिद है, बस फिर क्या था मैने झट से अपनी बाइक को उस दिशा में दौड़ा दिया।
नरसिंहगढ़ जाने वाले मुख्य मार्ग NH12 पे चिडीखो वन अभयारण के मुख्य द्वार से एक रास्ता कोटरा गांव को जाता है
उसी रस्ते पे मुख्य मार्ग से लगभग 3.5 की मी की दूरी पे बिहार नाम का एक गांव है वहां पहुँच के बाये तरफ एक टीले पे यह स्थान है।
टीले पे जाने के मार्ग पे सभी वाहन जा सकते है,
मै भी बाइक के साथ टीले पे पहुँच गया ,
वहां पहुँच के जो नज़ारा मेने देखा वो अदभुद था सीताफल का एक जंगली बाग़ , उसके सामने 16वी शताब्दी के संत पीर हाजी वली की दरगाह हे , दरगाह प्रांगण में एक छोटी सी 16वी शताब्दी की मस्जिद है , पूरा प्रांगण पथरों से निर्मित है,
शांत वतावरण में मोर और कई पक्षीयो की आवाज़ आपको अदभुद शांति का अनुभव देती है।
दरगाह प्रांगण से मिला हुआ एक स्मारक है जिसे सोलह खम्बी के नाम से जाना जाता है , यह 10वी शताब्दी का निर्मित है इसके 16 स्तम्भ आज भी मौजूद है, इन स्तंभों पे परमार काल की शिल्प कला साफ़ दिखाई देती है ।
यहाँ से चिडीखो और नरसिंहगढ़ की पहाड़िया और उसकी हरियाली आपको पचमढ़ी का अनुभव कराएंगी ।
अगर आप परिवार के साथ किसी ऐसे स्थान की तलाश में है जहां प्राकर्तिक सौंदर्य के साथ भीड़भाड़ न हो तो यह स्थान आपके लिए उपयुक्त है।
हा अगर आप वहाँ जाये तो खाने का सामान और पीने का पानी जरूर साथ ले जाये क्योंकि वहां आपको कोई दुकान नहीं मिलेगी।
स्थनीय लोगो का भरपूर सहयोग आपको अथिति देवो भवः की याद दिला देगा।

Friday, June 12, 2015

किसी ने मुझें समझा ही नहीं ...

क्या करू के किसी ने मुझे समझा ही नहीं
बचपन में थी मासूम और हिरनी की शरारत
तोडना चाहती थी सितारे किसी भी हद तक
पर क्या करू के किसी ने मुझे समझा ही नहीं

बातें करना चाँद से और सितारों को पकड़ना
हर छोटी सी बात पे पूरे घर से था लड़ना
लड़ना झगड़ना और सुबह को मान जाना
साडी हथेलियों पे कई ख्वाबो को सजाना
बाते थी अलग सोच ज़माने से जुदा
पर क्या करू के किसी ने मुझे समझा ही नहीं

फिर जो आया ज़माना नया सावन लेकर
हर शख्स था दीवाना मास मुझे देख कर
जो भी आया ज़िन्दगी में बस इक मतलब लेकर
मेने चाहां था उन्हे अपने अरमां देकर
बस ये किस्मत ने न चाहां के उन्हें अपना न सकी
पर क्या करू के किसी ने मुझे समझा ही नहीं

जब भी इस दिल में कोई प्यार का तूफान लाया
हर बार मुझे अपनी मोहब्बत के अंजाम पे रोना आया
दिल मेरा टूटा था कई बार मेरे अपनों से ही
पर क्या करू के किसी ने मुझे समझा ही नहीं

शम्मा जलती रहेगी परवाना कभी तो आएगा
अब मेरी जिद्द के आगे मुकद्दर भी झुक जायेगा
जीतूंगी इश्क की बाज़ी ज़माने से लड़ कर
कोई आएगा जो चाहेगा मेरा अपना बन कर
वक़्त चाहे गुज़र जाये जितना भी सही
पर क्या करू के किसी ने मुझे समझा ही नहीं





Tuesday, October 30, 2012

वाहन रेली

जेसे ही चुनाव का समय नज़दीक आया


बढती सड़क दुर्घटनाओं के मद्देनज़र , परिवाहन मंत्री ने मोटर साइकल रेली नीकालने का विचार बनाया

के चुनाव तक तो जनता के बीच चर्चा का विषय बनेंगे

बेलगाम नोजवानो को यातायात नियमो से अवगत करेंगे

हर उदास चेहरे पे मुस्कान खिलेगी

रेली से पहले एक लीटर पेट्रोल, समाप्ति पे एक पाव दारू मिलेगी

नेता जी का आफर सबको खूब भाया

रेली में जन सेलाब उमड़ उमड़ कर आया

दो दिन पहले जो हेलमेट की अनिवार्यता का पाठ पड़ा रहे थे

रेली में वो खुद सबके साथ बिना हेलमेट वाहन दोड़ा रहे थे

मंत्री जी का सख्त निर्देश था ...

हर वाहन पे तीन को बेठना ज़रूरी है ,चार भी बेठ सकते है अगर कोई मजबूरी है

गलती से एक ईमानदार यातायात सिपाही ने कुछ सवारों को रोकना चाहा

इस बात पे तो जेसे प्रलय ही आगया ...

मंत्री जी ने उस सिपाही को फ़ोन पे ही लताड़ा

“आज के दिन सारे नियम हमारी जेब के अंदर है इसलिए

यातायात पुलिस आज सिर्फ गाँधी जी के बन्दर है “

कुछ सावार दुर्घटनाओं के शिकार हो गए थे

क्युकी रेली समाप्ति से पहले ही वो दारू की बोतल में खो गए थे

दुसरे दिन सभी समाचार पत्रों ने मंत्री जी की रेली को खूब सराहा

ये समाचार पड़ते ही मंत्री जी ने ‘ जय हिंद’ का नारा लगाया

Wednesday, August 8, 2012

चीटिंग

समय के साथ हर चीज़ बदल जाती है खास तोर से आपके अपनों का आपके साथ रखरखाव , वर्मा जी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ , रिटायर होने के बाद जो दो लाख रुपया मिला वर्मा जी ने चारो लड़को में बराबर बाट दिया ये सोच के , के उनके बाद ये सब उनके लड़को का ही तो होगा , मंझले बेटे की ज़िद पे मकान के भी चार हिस्से कर दिए और वसीयत भी बनवा दी , पत्नी सुधा देवी ने समझाया भी था के इतनी जल्द बाज़ी ठीक नहीं पर वर्मा जी ने एक न सुनी,


अब जेसे जेसे दिन गुज़र रहे थे चारो बेटो और बहुओ का असली रंग सामने आरहा था , 40 साल तक वर्मा जी और उनकी पत्नी सुबह सूरज निकलने से पहले उठ जाया करते थे 8 बजे ठीक वर्मा जी को ऑफिस के लिए बस पकडनी होती थी , दोनों अक्सर बाते करते थे के रिटायर्मेंट के बाद आराम से 9 बजे उठा करेंगे और चाय की चुस्की के साथ अखबार पड़ा करेंगे .

पर ये शायद उनके भाग्य में न था , वर्मा जी की पत्नी की नई ड्यूटी ६ पोता पोती को सुबह स्कूल के लिए तेयार करना और फिर उनके लिए नाश्ता बनाना था ,पोता पोती के स्कूल जाने के बाद चारो लडको और बहुओ के लिए भी नाश्ता बनाना दोपहर का खाना बनाना और फिर रात का खाना बनाना और कभी अगर काम वाली बाई ने छुट्टी कर ली जो की वो अक्सर करती थी तो बर्तन धुलाई और झाड़ू पोचा भी करना पड़ता था .

वर्मा जी के हिस्से में पोता पोती को स्कूल लाना लेजाना , सब्जी भाजी लाना और चक्की से आनाज पिसवाना और कभी अगर गेस एजेंसी की गाडी समय पे गेस न लाये जो की अक्सर होता था तो साइकिल से गेस सिलेंडर लाना.

वेसे वर्मा जी को खुद की कोई चिंता न था लेकिन पत्नी की हालत देख के कभी कभी उनकी आँखों में आंसू आ जाते थे , उनकी समझ में बस ये नहीं आता था के आखिर 3 महीने में ये सब केसे बदल गया अभी 3 महीने पहले तक तो चारो बेटे और बहु कितने आज्ञाकारी थे अचानक केसे बदल गए , समझ में बस यही आया के अपना सब कुछ अगर अपनों के नाम करो तो अपनों को पराया होने में ज़यादा समय नहीं लगता.

जेसे तेसे 2 महीने और गुज़रे हालत बद से बदतर होते जारहे थे

एक दिन वर्मा जी ने अपने बेटो से वेष्णो देवी के दर्शन की इच्छा जाहिर की तो तीसरे नंबर के बेटे ने कहा "आप बस 1 महिना और इंतज़ार करो उसके बाद आपको हरिद्वार दर्शन करवाएंगे "

असलियत यह थी के वर्मा जी के सबसे छोटे बेटे का दोस्त NGO में काम करता था उस NGO का हरिद्वार में एक वृद्ध आश्रम था जहा उसने अपने पिता को भी रखवाया था , एक महीने बाद वहा नई भर्ती होने वाली थी वहा वर्मा जी और उनकी पत्नी के लिए लड़कों ने पहले से ही अप्लिकेशन दे रखी थी और मकान के लिए चारो ने एक बिल्डर से बात की थी जो वहा काम्प्लेक्स बनाना चाहता था जिससे चारो को मोटी रकम मिलती .

फिर एक दिन सुबह पासपोर्ट आफिस से एक आदमी वर्मा जी और उनकी पत्नी की जानकारी लेने आया , बेटे बहुओ को बड़ी हेरानी हुई , वर्मा जी ने बताया के कई महीनो पहले उन्होंने उनका और उनकी पत्नी का पासपोर्ट बनवाने के लिए आवेदन दिया था ये सोच के के रिटायर्मेंट के बाद पत्नी को कही घुमाने लेके जायेंगे , ये सुनते ही बेटे और बहुओ की हसी न रुकी , अपनी हसी रोकते हुए बड़ी बहु ने बोला अरे पापाजी अब आपकी उम्र तीर्थ यात्रा पे जाने की है न की विदेश यात्रा पे जाने की, सब फिर से हसने लगे , फिर मंझले बेटे ने पासपोर्ट आफिस वालो से बोला " अब आप आये हो तो जानकारी तो ले ही लो , इनका अगर पासपोर्ट बन गया तो हम लोगो का भी पासपोर्ट आराम से बन जायेगा "

निराश मन के साथ वर्मा जी ने सारी जानकारी दी .

जेसे जेसे दिन गुज़र रहे थे बेटे बहु की बदतमीज़ी बढती जा रही थी , छोटी छोटी गलतियों पे अब चारो बहु गलियों का भी इस्तेमाल करने लगी थी

फिर एक दिन डोर बेल बजी किसी ने वर्मा जी का पुछा , वर्मा जी ने बाहर जाके उस आदमी से बात की थोड़ी देर में वो आदमी चला गया , वर्मा जी जब वापस अन्दर आये तो चेहरे पे कुछ चिंता के भाव थे

छोटी बहु ने पुछा "कोन था " कोई नहीं बहु मेरे साथ ऑफिस में काम करने वाला पुराना दोस्त था यह कहते हुए वर्मा जी कमरे में चले गए .... वो पूरा दिन वर्मा जी किसी चिंता में डूबे रहे , रात को खाने के समय छोटे बेटे ने ने बताया के हरिद्वार से उसके दोस्त का फ़ोन आया था माँ पापा के लिए वहा सारा इंतज़ाम हो गया है अगले हफ्ते जाना होगा सभी लड़के और बहुओ ने एक दुसरे की आँखों में देखा ,दिल ही दिल में सब मुस्कुरा रहे थे ,

उस रात वर्मा जी धीरे धीरे अपनी पत्नी से बहुत देर तक बात करते रहे .

सुबह दूध वाले ने डोर बेल बजा बजा के पुरे घर को उठा दिया ... बड़ी बहु तुनक के अपने कमरे से निकलके बोली "माँ पापा आप लोगो को डोर बेल सुने नहीं देती क्या " लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया ... मंझले बेटे ने वर्मा जी के कमरे का दरवाज़ा खट खटाया ... दरवाज़ा खुला हुआ था , अन्दर देखा तो कोई नहीं था , किसी को कुछ समझ नहीं आया के आखिर माँ पापा आज सुबह से ही कहा चले गए

बड़ा बेटा झल्लाया "इनलोगों को अगर मंदिर जाना था तो पहले दूध लेना चाहिए था .... आने दो आज सारी पूजा पाठ करवाता हु".

दोपहर हुई शाम हुई रात आगई पर वर्मा जी और उनकी पत्नी वापस घर न आये सभी लड़के और बहुओ में उनके घर वापस न आने की चिंता से ज़यादा जो उस दिन काम करना पड़ा उसका गुस्सा था ,

आखिर दोनों चले कहा गए ...? , कही उन्हें हरिद्वार के प्लान का पता तो नहीं चल गया...? गुमशुदगी की रिपोर्ट करवा दे क्या ... ? कही कुछ चोरी करके तो नहीं ले गए....?

इन्ही सब आवाजों से उस रात सारा घर गूंजता रहा .

दुसरे दिन सुबह फिर दूध वाले ने घंटी बजाई काफी देर घंटी बाजके वो चला गया ....

फिर 9 बजे किसी ने घंटी बजाई काफी देर घंटी बजने के बाद जोर जोर से दरवाज़ा खटखटाया जिससे सभी की नींद खुल गई सब धीरे धीरे अपने कमरों से निकले छोटे बेटे ने जाके दरवाज़ा खोला , दरवाज़ा खुलते ही सबके पेरो के निचे से ज़मीन खिसक गई ..... दरवाज़े पे वर्मा जी नया सूट पहने हुए खड़े थे साथ में उनकी श्रीमती थी उन्होंने ने भी नई साड़ी पहनी हुई थी पीछे एक वकील और दो पुलिस वाले थे ... वर्मा जी और उनकी पत्नी के हाथो में बहुत सा सामान था लगता था जेसे बहुत शोपिंग की है

बड़े बेटे की आवाज़ निकली " पापा जी ये सब क्या है , और कहा चले गए थे आप लोग ..जानते है हम सब कितना परेशान हो रहे थे "

वर्मा जी ने मुस्कुराते हुए वकील की तरफ देखा , वकील ने बोलना शुरू किया " देखिये जी सबसे पहले तो आप सब खड़े मत रहो बेठ जाओ क्युकी अब जो में आप लोगो को बताने जा रहा हु वो सुनके आपको शायद चक्कर आजाये ,

ये जो मकान की वसीयत थी वो नकली थी असली वसीयत के हिसाब से माकन के मालिक वर्मा जी ही है उनके बाद ये माकन आपकी पूज्य माता जी का होगा और उनके बाद ये माकन अनाथ आश्रम को दान हो जायेगा फिलहाल आप सब लोग इस माकन में किरायेदार की हेसियत से हो इसलिए हर परिवार को 3000 रुपया महिना किराया देना होगा अगर यहाँ रहना हो तो

इसके बाद वर्मा जी अपना चश्मा ठीक करते हुए बोले '



मुझे रिटायर्मेंट के बाद 2 लाख नहीं बल्कि 10 लाख मिले थे पर मेने तुम लोगो को 2 लाख ही बताये 8 लाख मेरे दूसरे अकाउंट में है असल में मेरे रिटायर्मेंट के बाद से अब तक का जो समय गुज़रा वो तुम सबकी परीक्षा का समय था और कल रिज़ल्ट का दिन था , रिज़ल्ट में तुम सब फेल हो गए , फिर वो अपनी छोटी बहु को देखके बोले कल मुझसे कोई दोस्त मिलने नहीं आया था बल्कि डाकिया था जो हमारा पासपोर्ट लाया था

कल में अपनी धर्मपत्नी के साथ विदेश यात्रा पे जा रहा हु और 2 महीने बाद जब हम वापस आये तो 50000 जो मेने तुम चारो को दिए है वो मुझे वापस कर देना और उसके साथ 2 महीने का मकान का किराया भी यानि तुम चारो मुझे 56000 - 56000 दोगे दो महीने बाद और अगर ऐसा न हुआ तो तो तुम लोगो का सारा सामान तो यही रहेगा पर तुम लोग सड़क पे होगे , और अगर सब ठीक से हुआ तो ठीक वरना ये पुलिस वाले धक्के मारके तुम्हे यहाँ से निकालेंगे

और हा तुम लोगो ने जो हमारे लिए हरिद्वार का प्लान बनाया था वो मुझे तब ही पता चल गया था जब रात को तुम लोग इस बारे में बात कर रहे थे, फिर वर्मा जी ने अपनी श्रीमती को मुस्कुराके देखा और बोला " खेर कोई बात नहीं हरिद्वार जाना सबके भाग्य में नहीं होता "

चलो अब हम यहाँ से चलते है आज रात में अपनी पत्नी के साथ ५ स्टार होटल में रुकुंगा फिर सुबह हमारी फिलाईट भी है ... हरिद्वार की नहीं विदेश यात्रा की " यह कहते हुए वर्मा जी पत्नी के साथ वापस चले गए

चारो लडको और बहुओ के चेहरे का रंग उड़ चुका था , किसी ने एक धीमी आवाज़ में बस यही कहा " माँ और पापा जी ने हमारे साथ चीटिंग की "

Sunday, July 1, 2012

Miss U Maa....

Maa how r u, its five years I haven’t see u and babu ji … really missing u. Sapna also miss u a lot , mom pease come to me for few days , I m sending u rail ticket , ok Maa I m waiting for u Love u Maa Call disconect .. Next call : Hello doctor, no need to arrange any expensive nurse for my wife, my mom is coming.

appoitment: अपोइन्टमेंट

मुरारी बाबू के कदमो की रफ़्तार अब और तेज़ हो गई थी पीछे आने वाले दोनों आदमियों ने भी अपनी रफ़्तार तेज़ कर दी थी मुरारी बाबू कुछ समझ नहीं पा रहे थे के आखिर ये गुंडे बदमाशों की तरह दिखने वाले आज ऑफिस से ही उनके पीछे क्यों है , वेसे कल भी ऑफिस ख़त्म होने के बाद उनकी नज़र इन दोनों आदमियों पे पड़ी थी, लेकिन सरकारी दफ्तर में तो लोगो का आना जाना लगा ही रहता है और वो भी रजिस्ट्री ऑफिस जेसा दफ्तर जहा रोजाना लाखो की रिशवत का आवन होता है , इसलिए वहा इन जेसे लोगो का होना आम बात है वेसे ओहदा तो मुरारी बाबू का भी कोई कम न था कई बार इन जेसे लोगो ने उन्हें लालच की पुडिया देने की कोशिश की थी लेकिन पिताजी की नसीहत का असर था या हिम्मत की कमी जो वो आज तक रिशवत की गंदगी से बचे हुए थे क्युकी भगवान की किरपा से घर का भरण पोषण तो उनकी पगार से ही हो जाता था , बड़ी बेटी की शादी हो ही चुकी थी बस अब बड़ा बेटा बिट्टू और छोटी बेटी गुडिया की शादी ही बची है , रिटायरमेंट में अभी 4-5 साल बाकि है और गुडिया को शादी के लिए अभी 2-3 साल है , बिट्टू की पढाई तो हो ही चुकी है हा बस काफी कोशिशो के बाद भी बेचारे को सरकारी नोकरी नहीं मिल पाई , पिछले 2 साल से प्राइवेट नोकरी कर रहा था फिर भी ठीक है कम से कम अपना खर्च तो चला ही लेता है अपनी नोकरी से . हा बस बेचारा अपनी दोस्त सपना से शादी नहीं कर पा रहा है , सपना के पिता को दामाद सरकारी नोकर ही चाहिए और वो क्यों न चाहे आखिर सपना उनकी इकलोती बेटी जो है और वो खुद भी 'ए क्लास अफसर जो है , इसीलिए तो उन्होंने बिट्टू को 1 साल का समय दिया था के वो इस एक साल में कोई सरकारी नोकरी हासिल कर ले या फिर सपना को भूल जाये . इन्ही सब खयालों में मुरारी बाबू कब सुनी सड़क तक आ गये उन्हें पता ही नहीं चला बस थोड़ी ही देर में घर भी आजायेगा , पीछे मुड के देखा तो वो बदमाश भी दिखाई नहीं दिए अब जाके उनकी जान में जान आई लेकिन घबराहट की वजह से पसीना रुकने का नाम नहीं ले रहा था, बार बार पीछे मुड के देख रहे थे के अचानक पेड़ की आड़ से दोनो बदमाश निकले एक बदमाश के हाथ में कुछ चमक रहा था मुरारी बाबू कुछ समझ पाते तब तक वो चमकदार चीज़ बड़े से छुरे के रूप में मुरारी बाबू के पेट में घुस चूका था एक के बाद एक कई वार करके दोनों बदमाश भाग निकले मुरारी बाबू बस एक चीख ही निकाल सके . अगले दिन मुरारी बाबू के क़त्ल की खबर पूरे शहर में फेल गई थी उनके मोहल्ले में तो सन्नाटा पसरा हुआ था , अंतिम यात्रा में सारा मोहल्ला और ऑफिस के सभी लोग शामिल हुए अगले दिन ऑफिस के बड़े बाबू मुरारी बाबू के घर आके उनकी विधवा से बोले " भाभी जी नियम के अनुसार मुरारी बाबू की अकस्मात् मृत्यु की वजह से उनकी नोकरी अब उनके लड़के को मिल सकती है , अगले सोमवार बिट्टू को उसके सारे सर्टिफिकेट लेके दफ्तर पंहुचा देना" भगवान् एक रास्ता बंद करता है तो दूसरा खोल देता है ये सोच के मुरारी बाबू की पत्नी के आँखों में आंसू आगये कुछ दिनों बाद रात के अँधेरे में गली के नुक्कड़ पे बिट्टू से मिलने २ आदमी आये एक ने बदमाशों सी कड़कड़ी आवाज़ में बिट्टू से बोला : तुम्हारा काम हो गया तुम्हे अपोटमेंट भी मिल गया है अब हमारे पैसे निकालो बिट्टू : अरे अपोटमेंट नहीं अपोइन्टमेंट और मेने आप लोगों को यहाँ आने को माना किया था न , बाकि के पैसे अपोइन्टमेंट लैटर मिलते ही में आपको दे दूंगा आदमी : देखो बिट्टू बाबू अपोटमेंट लैटर हम कुछ नहीं जानते तुम बस बाकि के पैसो का इंतज़ाम जल्दी कर लो अगर कोई चालाकी की
 कोशिश की तो सबको पता चल जायेगा के सरकारी नोकरी के लालच में तुमने अपने पिता को ... बिट्टू उन दोनों की बात बीच में कटते हुए बोला 'बकवास बंद करो 4 दिन में तुम्हे तुम्हारे बाकि पैसे मिल जायेंगे, अब जाओ यहाँ से' ..

Wednesday, February 1, 2012

टिन्नी की कहानी ......

दो बहनों में एक थी वो

भोली सी मासूम

परियो की गुडिया के जेसी

नाम था उसका टिन्नी..

टिन्नी को बस ये लगता था

बडकी चलाती अपनी धाक

मम्मी पापा भी तो हर दम

देते थे बडकी का साथ

येही सोच के छोटी टिन्नी

हो जाती थी बहुत उदास....हो जाती थी बहुत उदास...

फिर हुआ यु इक बार

सर्द हवा ने टिन्नी को जब दिया बुखार

नींद उड़ी मम्मी पापा की

बडकी भी हो गई उदास

कई राते जगी थी सब ने टिन्नी के ही आस पास

तब जाके जाना टिन्नी ने

कितना सब करते है प्यार ...कितना सब करते है प्यार...

सोला का जब हुआ था सावन

मोसम ने भी बदली करवट

बडकी हो गई थी सायानी

टिन्नी का बाकि भोलापन

ऐसे में इक दिन अचानक

आया था इक राजकुमार

सब बातो से बेखबर दोनों

झूल रही सावन का झूला..

राजकुमार ने मम्मी पापा से

मांग लिया बडकी का हाथ

पार गया वो सात समंदर

बडकी को लेके अपने साथ

जाते जाते बडकी ने टिन्नी को यु गले लगाया

जेसे हो वो उसी का साया.... जेसे हो वो उसी का साया...

धीरे धीरे समय था गुज़रा

टिन्नी भी हो चली सियानी

अब वो भी करती थी अपने राजकुमार का इंतज़ार

मन में उसके इक डर था

नहीं मिलेगा उसको कोई राजकुमार...नहीं मिलेगा उसको कोई राजकुमार...

इक दिन ऐसे ही टिन्नी के पास आया इक जोगी

था वो बिलकुल मस्त मोला अपने मन का भोगी

जोगी वो मस्तान था

न कोई वारिस न सामान था

वो जोगी भी हुआ दीवाना

टिन्नी की मतवारी आँखों का

पर कुछ ऐसा था उसमे जो टिन्नी को था खूब लुभाता

अपनी मोहक बातो से वो टिन्नी को था खूब हसाता....टिन्नी को था खूब हसाता

चाँद की शीतल रात में इक बार

टिन्नी से वो मिलने आया

देख के उसकी मोहनी आँखे

टिन्नी को कुछ समझ न आया

हरयाली फूलो के उपर

टिन्नी को वो लेके आया

जोगी के मतवारे नेनो में

टिन्नी खो गई सब भुलाके...टिन्नी खो गई सब भुलाके

भोर ने अपना अंचल खोला

चिडियों ने जब शोर मचाया

आँख खुली टिन्नी की जब

खुद को इक जंगले में पाया

तभी किसी की आहट ने

टिन्नी का था धयान हटाया

सफ़ेद घोड़े पे आया कोई

था वो देश का राजकुमार..था वो देश का राजकुमार...

टिन्नी से वो यु बोला ,तुम ही तो हो मेरा प्यार,

टिन्नी के तो होश खो गए

'में केसे हो सकती हु इक राजकुमार का प्यार

फिर टिन्नी को बहो में भरके

घोड़े पर वो हुआ सवार

अगर जो पूछा राजकुमार ने 'तुम यहाँ केसे आई'

येही सोच के टिन्नी की दोनों आँखे थी भर आई

केसे बताये वो राजकुमार को उस कपटी जोगी की बात

जिसने करके मोहक बातें छोड़ दिया जंगले में लाके

राजकुमार ने फिर बोला

'इक जोगी महल में आया था

मेरा जीवन साथी यहाँ मिलेगा ऐसा मुझे बताया था'

टिन्नी को कुछ समझ न आया

था ये कोई सपना या उस जोगी की माया....उस जोगी की माया

दूर पहाड़ी पर से कोई

दोनों को था देख रहा

गोर से देखा टिन्नी ने

वो उस जोगी का चेहरा था

देख के उनकी सुन्दर जोड़ी

जोगी भी मुस्कुराया था

राजकुमार ने जब ढूंडा

वो कही नज़र न आया था....वो कही नज़र न आया था...

अब टिन्नी उस राजकुमार के राजमहल की रानी थी

छोटी प्यारी सी ये टिन्नी की कहानी थी ...टिन्नी की कहानी थी...

Saturday, January 1, 2011

आसमा....

अपनी ऊँचाई पे इतरा न ऐ आसमां
हमने बारिश में तुझे रोते हुए देखा हे
सुबह को तेरी अठखेलिय देखी हे
दोपहर में तुझे जलते हुए देखा हे
हर रोज़ तुझे इंसानों सा रंग बदलते देखा हे

पूनम का तेरा यौवन , अमावस में  मुँह छुपाते देखा हे
बादलो से  अनबन , बदली छटते तेरा अकड़ना देखा हे
हर रोज़ तुझे इंसानो सा रंग बदलते 
देखा हे
 हमको मालूम हे हकीकत तेरी ऐ आसमा
हमने बारिश में तुझे रोते हुए देखा हे।।

Sunday, August 15, 2010

'चवन्नी'

दिवाली पे इतनी सर्दी शायद ही पहले कभी पड़ी हो . उस चुभने वाली सर्दी ने दिवाली का सारा मज़ा ही बिगड़ दिया था . हर साल की तरह इस साल भी तिब्बती लोग अपने गर्म ऊनी कपड़ो की दुकाने सजा चुके थे. जेसे जेसे सर्दी बड़ती थी इन तिबत्तियो के चेहरों में ख़ुशी बड़ती जाती थी. तिबत्तियो के साथ सामने के फूटपाथ पे रहने वाली बुडी भिखारन के लिए भी यह सुनेहरा मोका होता था , इन दुकानों की वजह से सड़क पे काफी भीड़ भाड़ रहती हे, वही बेठे बेठे ही उसके भीख का कोटा पूरा हो जाता था यहाँ वहा भटकने की ज़रुरत नहीं पड़ती थी.
लेकिन फिर भी उसके सर्दी से फटे हुए झुर्रीदार चेहरे पे गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था , वजह सिर्फ एक ही 'चवन्नी' .
वेसे बस्ती वाले और फुटपाथ पे से रोज़ गुजरने वाले चवन्नी को बुडिया की नाती पोती ही समझते थे लेकिन यह बात सिर्फ बुडिया ही जानती थी के चवन्नी से उसका कोई खून का रिश्ता नहीं हे बलकि वो तो कभी कभी उस मनहूस दिन को कोसती हे जिस दिन यह चवन्नी उसके गले पड़ गई थी.
उस रात को 5-6 साल हो चुके थे जिस दिन एक बड़ी सी गाड़ी से कोई लग भाग दो- तीन साल की बच्ची को सोती हुई हालत में फुटपाथ पे छोड़ गया था. सुबह लोगो की चहल पहल से बच्ची की नींद खुली तो उसने रोना शुरू कर दिया , अपनी बुडी आँखों से बुडिया ने सारा माजरा देखा था लेकिन उसे क्या जिसकी बला हो वो जाने, लेकिन बुडिया की चिंता तब बड़ी जब बच्ची ने बुडिया के झोपडे के सामने आके और तेज़ रोना शुरू करदिया. पहले तो बुडिया ने कई बार धुतकारा लेकिन फिर शायद वो भुखी हो यह जान के बासी पाव उसे दे दिया और खुद काम पे निकल गई .
शाम को जब बुडिया वापस लोटी तो देखा वो बच्ची उसी के झोपडे में सो रही थी, उसकी अध् खुली मुठ्ठी में एक चवन्नी नज़र आ रही थी , शायद किसी ने भीख में दी थी, बस उसी दिन से उसका नाम चवन्नी पड़ गया और वो बुडिया के गले पड़ गई .
वेसे बुडिया ने चवन्नी से छुटकारा पाने के लिए एडी चोटीi का जोर लगाया लेकिन उसकी सारी कोशिश नअकाम रही.
पंडू हवलदार को सारी कहानी सुनाई लेकिन उसके कान पे जू तक न रेंगी.
हिम्मत जुटा के कोतवाली पोहची तो बड़े साब ने यह कह के "हमारे पास बच्ची गुम होने की कोई रिपोट नहीं हे"
उसे धुत्कार के भगा दिया.
लल्लू पनवाडी ने बताया नए मोहल्ले में मंगत भाई नाम का एक आदमी आश्रम चलता हे सो वो उसके पास पहुच गई,मंगत भाई ने उसकी सारी कहानी सुनी और उसपे विशवास भी किया, मंगत भाई ने बड़े प्यार से बच्ची के सर पे हाथ फेरा और उसे गोर से देखा , बुडिया को एक सूती साडी भी दी नोकर को भेजके बुडिया के लिए चाय भी मंगवाई , सच मुच मंगत भाई बहुत भले इंसान हे सोचते हुए बुडिया ने चाय की चुसकिया ली, बरसात के मोसम में गरमा गर्म चाय की बात ही कुछ और थी , बच्ची बुडिया और मंगत भाई दोनों को अजीब नजरो रे देख रही थी , बुडिया ने उसपे एक नज़र डाली और और मंगत भाई का धन्यवाद करते हुए वहा से चल दी , बहार सड़क पे हलकी बूंदा बंदी शुरू हो गई थी , बुडिया ने एक बार फिर पलट के देखा तो आश्रम की गेलरी में से बच्ची उसी को देख रही थी , तभी अचानक बुडिया को याद आया के मंगत भाई ने जो साडी दी थी वो तो उसने आश्रम में ही छोड़ दी बिजली की तेरह बुडिया आश्रम की और बड़ी बारिश की वजह से अँधेरा हो गया था आश्रम की शायद बत्ती भी गुल हो गई थी , बुडिया की साडी वही राखी थी जहा वो बेठी थी बहार गेलरी में बच्ची बारिश की बुँदे देख रही थी मंगत भाई शायद अन्दर चले गए थे , साडी उठा के बुडिया वापस पलटी ही थी के उसके कानो में मंगत भाई की आवाज पड़ी, वो शायद किसी से टेलीफोन पे बात कर रहे थे " आज ही आई हे , शकल सूरत से अच्छे घर की लगती हे , नहीं नहीं तीस हज़ार से एक भी पैसा कम नहीं , मुझे क्या पता नहीं के तुम इसके कितने दाम बनाओगे"
फोन काटने के बाद मंगत भाई गेलरी में आये तो बच्ची गायब थी.
ऑटो रिक्शा बुडिया की झोपडी के सामने ही रुका , पेसे देने के बाद बुडिया बच्ची के साथ नीचे उतरी आज शायद जीवन में पहली बार बुडिया ऑटो रिक्शा में बेठी थी आखिर जल्द से जल्द मंगत भाई के आश्रम से दूर जो जाना था
बच्ची की तरफ देखा तो बुडिया को समझ नहीं आरहा था के वो क्या करे.
बुडिया फुटपाथ पे बने अपने झोपडे के सामने बेठ गई , बच्ची भी उसके पास बेठ गई , थोडी ही देर में बुडिया ने बच्ची को अपने साथ रखने का मन बना लिया , इस ह्रदय परिवर्तन का कारण था के लोग बच्ची को भी भीक देके जा रहे थे. धीरे धीरे चवन्नी के अन्दर वो सभी गुण आ गये जो एक भिखारन में होने चाहिए.
लेकिन आज सड़क पे इतनी आवक जावक हे मगर वो करमजली चवन्नी न जाने कहा मर गई, हरामखोर को रात भर भूखा रखूंगी तो सारी अकल ठिकाने आ जायेगी बुदिया बड़बडाये जा रही थी .
अभी अगर मेरे साथ होती तो न जाने कितनी भीख जमा हो जाती के रात को कलारी से अंग्रेजी का पव्वा और मद्रासी की बची हुई मछली.... सोच के बुडिया के पोपले मुह में पानी आगया लेकिन दुसरे ही पल जेसे ही उसकी नज़र लंगडे भिखारी पे पड़ी बुडिया तिलमिला उठी , चवन्नी के न होने की वजह से आज तो लंगडे को भी बहुत भीख मिल रही हे , आखिर बुडिया से बर्दाश्त न हुआ " ऐ लंगडे तुझे कितनी बार मना किया हे फुटपाथ के इस तरफ न आया कर , तेरी समझ में नहीं आता , दूसरी बार यहाँ दिखा तो दूसरी टांग भी तोड़ दूंगी " अपना डंडा हवा में उठा ते हुए बुडिया चिल्लाई , "जाता हु जाता हु ठठरी पे बेठी हे और बाते बड़ी बड़ी , कहा लेके जायेगी इतना माल " धीरे धीरे बडबडाते हुए लंगडा सड़क के दूसरी तरफ पहुच गया.
जेसे जेसे समय गुज़र रहा था सर्दी बढती जा रही थी . गर्मियों में रह रह कर बुडिया जिस सूरज को कोसती थी आज उसी को बार बार याद करके थोडी गर्मी महसूस कर रही थी. आज तो जलाने को भी कुछ न बचा था जो पुराने टायर थे वो तो कल रात ही जला दिए थे अब तो एक ही चारा था , चवन्नी आये तो उसे भेज के कुछ कचरा जमा किया जाये जलाने के लिए. एक तो सर्दी ने परेशान किया हे उपर से आज पहली बार इतनी देर के लिए चवन्नी गायब हुई थी.
चवन्नी के बारे में सोच सोच के आज बुडिया का मन भी भीक मांगने में नहीं लग रहा था. थोडी थोडी देर में वो बडबडाने लगती थी 'अच्चा हे निगोडी मर जाये तो पिंड छुटे.
शाम का समय हो रहा था रास्ते पे लोगो की आवक भी कम हो गई थी , सर्दी की वजह से आज नुक्कड़ का चाये वाला भी अपनी गुमठी जल्दी बंद कर गया था , कुछ दूर पे आतिशबाजी की दुकाने लगी हुई हे वह काफी भीड़ थी , आज दिवाली जो हे पर सर्दी की वजह से बुडिया की वहा जाने की हिम्मत न हो रही थी .
वेसे बुडिया को ठीक से याद तो नहीं पर 70-75 सावन तो देख ही चुकी थी पर इतनी सर्दी उसने आज तक न देखि थी .
पठाखे फूटने की आवाजे आना शुरू हो गई थी , शाम ढलने लगी थी , अब बुडिया को चवन्नी की ज़यादा चिंता होने लगी थी , आखिर उसने हिम्मत जुटा के चवन्नी को ढूँढने जाने का मन बना ही लिया , अपनी गठरी को बगल में दबाके, डंडा उठाके बुडिया अभी कुछ कदम ही चली थी के दूर से किसी को आता देख रुक गई और वापस अपनी झोपडे में आगई, एक ही पल में बुडिया के चेहरे से चिंता के भाव ख़त्म हो गए थे लेकिन गुस्सा बाद गया था.
लडखडाती चाल के साथ एक लड़की झोपडी की तरफ चली आरही थी , लगभग 8-९ साल की लड़की जिस्म पे एक पुरानी फटी हुई फ्राक और सलवार जिनका रंग पहचानना भी मुश्किल था सर पे एक कपडा ऐसे बंधा हुए था के दोनों कान छुप जाये सर्दी से बचने के लिए, पेरो में दो अलग तरह की चप्पल थी, चेहरे पे मासूमियत के साथ थकान साफ़ नज़र आरही थी उसकी चाल से ऐसा लग रहा था के पेरो में कोई ज़ख्म हो जिसकी वजह से चलने में दिक्कत हो रही थी. जेसे ही वो झोपडे के सामने पोहची सबसे पहले उसका सामना बुडिया की कडकडाती आवाज़ के साथ हुआ " कहा मरने गई थी हरामखोर, बाहर निकल जा आज के बाद अपनी मनहूस शकल मत दिखाना"
बुडिया की डाट और सर्दी की कपकपाहट के साथ चवन्नी के आंसू बहने लगे.
"अब कुछ बोलेगी भी या ज़बान बेच आई हे , बोल कहा मर रही थी और ये हाथ में क्या छुपा रही हे"
डर की वजह से चवन्नी ने हाथ आगे कर दिया उसके हाथ में एक दस का नोट था .
बुडिया फिर गरजी 'कहा से आया ये दस का नोट'
अपने आंसू पोछते हुए चवन्नी ने बताया 'अम्मा कल रात तुम सर्दी की वजह से बहुत ख़ास रही थी इसलिए में बस्ती में तुम्हारे किये गरम कपडा मांगने गई थी, मेने बहुत लोगो से माँगा पर किसी ने नहीं दिया , फिर जब में वापस आरही थी तो नुक्कड़ पे एक आदमी ने मुझसे पूछा क्या चाहिए मेने कहा गरम कपडा तो वो बोला मेरे साथ चलो में देता हु , वो मुझे बस्ती के पीछे एक घर में लेके गए रास्ते में उन्होंने मुझे एक चाकलेट भी दी ,
पर अम्मा वो बहुत खराब आदमी था, रोते हुए चवन्नी बोली , पता हे अम्मा उसने मेरी फ्राक ....... दिवाली के पठाखो की आवाज़ तेज़ हो गई , थोडी देर बाद पठाखो की आवाज़ धीमे हुई ...... बुडिया अपने झोपडे से बाहर निकल कर बस्ती की तरफ मुह करके गन्दी गालिया बकने लगी

बदलाव :

बदलाव

वृद्ध आश्रम की वार्डेन ने तेज आवाज़ लगाई "शोभा दीदी जल्दी आओ आपके बेटे का फ़ोन आया है" शोभा को तो अपने कानो पे विश्वास ही नहीं हो रहा था के उसका बेटा उसे कभी फ़ोन भी कर सकता है . पति के स्वर्गवास के बाद कुछ दिन तो सब ठीक चला लेकिन फिर बेटा कुमार पुश्तेनी मकान अपने नाम करने की जिद्द करने लगा सो शोभा ने वो भी कर दिया बस थोड़े ही दिन में सब बदल गया इकलोता बेटा और बहु के व्यवहार में बहुत बदलाव आ गया , अब छोटी छोटी बातो के लिए उसे अपने बेटे और बहु की डाट सुन्नी पड़ती फिर कुछ समय बाद बहु ने बेटे को वृद्ध आश्रम का पता बता दिया और तब से शोभा ने इस आश्रम को ही अपना संसार बना लिया था पहले साल तो एक बार बेटा विदेश जाने से पहले मिलने भी आया था लेकिन पिछले पांच सालो से उसने कोई खबर ही नहीं ली थी.
बेटे के फ़ोन आने की ख़ुशी ने उसे मानो पागल सा कर दिया था नंगे पैर ही भागती हुई वार्डेन के कमरे पे पहुची और झट से फ़ोन उठा लिया 'हेल्लो' हेल्लो माँ में कुमार बोल रहा हु , केसी हो तुम ! सालो बाद बेटे की आवाज़ कान में पड़ते ही आँखों से आंसुओ की लड़ी बहने लगी
'में ठीक हु तू केसा है ' में भी ठीक हु माँ , माँ में और सपना चाहते हे की अब तू हमारे साथ ही रहे , हमें तेरी बहुत चिंता होती हे , तू सारी पुरानी बाते भूल जा , बस तयारी कर ले में कल तुझे लेने आरहा हु... शोभा के रूआसे गले से बड़ी मुश्किल से आवाज़ निकली 'बेटा मुझे तो पूरानी कोई बात याद नहीं, बहु केसी हे ? माँ वो भी ठीक है तुझे बहुत याद कर रही है, में कल तुझे लेने आरहा हु तू तैयार रहना, अच्छा माँ में अब फ़ोन रखता हु '
कुछ देर तो फ़ोन के रिसीवर को ही अपनी छाती से लगा के शोभा रोती रही फिर वार्डेन के सँभालने पर आंसू पोचती हुई बोली मेडम मेरा बेटा मुझे अपने साथ रखेगा वो मुझे लेने आने वाला हे . ये खबर आश्रम में फैलते ही शोभा को बधाई देने सारा आश्रम पहुच गया.
आखिर भगवान ने शोभा की सुन ही ली और उसके बेटे में बदलाव ला दिया .
दस दिन पहले :
बधाई हो mr कुमार आप बाप बनने वाले है, 'Thank you डॉक्टर' कहते हुए कुमार ने शरारत भरी मुस्कान से सपना की तरफ देखा
डॉक्टर: लेकिन कुमार अब तुम्हे सपना का बहुत ध्यान रखना पड़ेगा क्युकी ये बहुत क्रिटिकल केस हे ऐसे केसों में ज़रा सी लापरवाही माँ और बच्चे के लिए जान लेवा हो सकती है , सबसे पहले तो तुम सपना को ऑफिस से छुट्टी दिलाओ और फिर एक आया का इंतज़ाम करो जो इसकी सुबह शाम देखभाल करे .
कुमार: लेकिन डॉक्टर आप तो जानते है इस शहर में आया मिलना कितना मुश्किल है और जो मिलती है वो बहुत ज़यादा पैसा मांगती है
फिर कुछ सोचते हुए कुमार ने सपना की तरफ मुस्कुराते हुए देखा और बोला 'ओके डॉक्टर आया का इंतज़ाम हो जायेगा'....

Friday, October 16, 2009

DIWALI : The Victory of Light over Darkness



Well friends today I tried to bring some information related to Diwali because there are many peoples who don’t know the reason behind celebration of this great Indian festival :

India is a multi religious country, every year we enjoy lots of festivals belonging to different religions. These religions symbolize unity in diversity.
Dussehra, Diwali, Eid, Holi, Christmas all have their own unique style of celebration. Among the Hindu festivals Diwali the festival of light is the most popular.
It is celebrated with fervor and gaiety among all races and religions. Although the festival seasons start from Dussehra which falls 20 days before Diwali, during the Hindu month of Ashvin.
According to legend, Shri Ram killed the demon king of lanka, Ravana.
Shree Ram prayed to ‘Devi Durga’ the Goddess of war and on 10th day of the battle, Shri Ram killed Ravana and it is for this reason that Dassehra is also called ‘Vijaydashmi’.
After 20 days of Dassehra, Diwali is celebrated in the Hindu month of Kartik (around Oct-Nov) on amavasya. Hindus all over the world celebrate the festival with great enthusiasm.
Diwali symbolize the victory of Light over Darkness, it is a mark of triumph of good over evil. This day is devoted to Goddess Lakshmi as it is believed that she pays each house a visit on this day. People hold Lakshmi pujan in their homes.
Diwali is also the festival of sweets and feasting. In the evening diyas(earthen lamp) and candles are placed all around the house after witch the entire family assembles for puja.
A big diya is lit and later taken around light all the candles and diyas. Every town, village and the sky is lit with thousands of crakers bursting and diffusing colors in the sky.
Traditionally this day marks the commencement of the new financial year. It is a very special day for the business community, many business deals are finalized around this time, employer give diwali bonus and other gifts to their staff.
There are some negative sides of this festival too. Some people indulge in gambling on the day of Diwali because it is believed that the wife of Lord Shiva, Goddess Parvati, played a dice game with him on this day and therefore, those who gamble on this auspicious day are blessed with prosperity.
The celebration of this five day festival commences on Ashayuja bahula chaturdashi and ends on Kartika shudda vijaya.
The first day of this festival begins with dhan trayodashi or dhanteras. According to the scriptures Lord Dhanvantari who is also an incarnation of Lord Vishnu came out of the ocean that was churned by the Devtas and Rakshas on the day of Dhanteras. He appeared with ‘Ayurveda ‘for the welfare of mankind.

After Dhanteras the second day of Diwali is ‘Narak Chaturdashi’ It is popular also as choti Diwali. Narak Chaturdashi is related to the demon king ‘Narkasur’ who was the ruler of ‘Pragjyotishpur’ a province near Himalaya. Once Narkasur defeated Lord Indra during a war and snatched away the megnificient earring of Goddess Aditi, who was the ruler of Suryalok and also a relative of Lord Krishna’s wife Satyabhama. By the help of Lord Krishna Satyabhama defeated Narkasur and released all women and saints who were imprisoned by Narkasur in his palace. Satyabhama also restored the megnificient earring of Goddess Aditi.

The third day of Diwali also called Badi Diwali, The main day of celebration. Behind the celebration of Diwali there are many stories. The famous one is that Sri Ram, The seventh incarnation of Lord Vishnu and the eldest son of king of Ayodhya, Dashrath. Sri Ram took birth to free the earth from the cruelty and sin of ten-headed demon king of Lanka Ravana.

The forth day of Diwali is devoted to Govardhan puja (worship of Mount.Govardhan)
According to Vishnu Puran the people of gokul and Brij use to offer prayer to Lord Indra because they believe he was Indra who sent rains for them but Lord Krishna told them it was govardhan parvat and not Lord Indra who caused rains for them so first they should worship Govardhan Parvat and then Lord Indra so the people did the same but it made Indra furious resulting in heavy rains at Gokul ; than Lord Krishna came forward to save the people and lifted Govardhan Parvat as an umbrella on the little finger of his right hand for everyone to take shelter under it. After this incidence Lord Krishna also called Girdhari and Govardhan Dhari.

The fifth day of Diwali is Bhai Dooj also called ‘Yamdwitiya’ because Yamraj the God of death visited his sister ‘Yamuna’ on this day, the day ‘Shukla Paksh Dwitiya’ in the month of kartik.

Diwali is also an important day in Sikh community because the sixth guru ‘Guru Hargovind Ji’ came back from the captivity of Gwalior fort; people lighted lamps in his way to welcome him.

The day of Diwali is also very important for Jain community; Lord Mahaveer attained Nirvana or Moksha this day.
The Jain businesspeople traditionally started their accounting year from Diwali. They take it as a good omen.

Saturday, September 12, 2009

Charlie Chaplin's Famous Quotes.....







Friends following are some Heart Touching Quotes of Charlie Chaplin...




1. Nothing is permanent in this world not even our Troubles !

2. I like walking in the rain, because nobody can see my tears !

3. Life is a tragedy when seen in close-up, but a comedy in long-shot !

4. To truly laugh, you must be able to take your pain, and play with it!

5. We think too much and feel too little !

6. Words are cheap. The biggest thing you can say is 'elephant' !

7. The most wasted day in life is the day in which we have not laughed !

Wednesday, August 26, 2009

The Hidden truth of 1857 Revolt


According to the WIKIPEDIA (Indian Rebellion of 1857) and some other History Book the driving forces behind the 1857 revolt were the Ulema (Islamic cleric) around the Delhi region. The Ulema as a religious duty issued the fatwa of jihad against the English; practically participated in the war; encouraged the Muslim community and led the revolutionary insurgents.
Ulema’s statements against the East India Company were a motivating factor for many among the general masses and the company's army.
The names of leading Ulema who played an important role in the revolt of 1857 are as follows: Mufti Sadruddin Azurda, Allama Fazle Haq Khairabadi, Maulana Faiz Ahmad Badayuni, Maulana Kifayat Ali Kafi Moradabadi, Maulana wahhajjuddin Moradabadi, Mufti Inayat Ahmad Kakorvi, Moulana Rahmatullah Kairanvi, Maulana Dr. Wazir Khan Akkarabadi, and Maulana Imam Baksh Sahbai Dehlavi.
According to several books dealing with the revolution, around 15000 fifteen thousand Ulema were martyred during the War of Independence in 1857.
In one of a heart shaking incidence around 70 Ulema together had been hang by British army on trees near Delhi.
According to one of a book (Tarikh e Riyasat e Bhopal) written by Late Qazi of Bhopal Allama Wajdul hussaini. At the time of 1857 revolt two men from Bhopal ; Fazil Mohammad khan and Jamal Mohammad khan played an important role they raised there sword against British Government in village Gadi near Bhopal and get martyred.
That time in Bhopal also Ulema issued fatwa of Jihad against British Army.
In Sehore Hindu and Muslim together raised their arms against British Goverment.
The Muslims and the Hindus were equally complaining against interfere in their religious affairs by British government. This resulted in the Revolt of 1857 where in the Muslims as well as the Hindus equally participated. One the one side, the Muslim leaders like Bahadur shah Zafar, General Baht Khan Rubella, Prince Faros Shah, Begum Hazrat Mahan, General Azimullah Khan Kanpuri, Nawab Tafazzul Husain, Nawab Majduddin Moradabadi, Nawab Mahmood Khan Bijnori were spending their energies to make this Revolt a successful one, on the other, Nana, the Peshwa, Tatia Tope. Rani Lakshamibai, Ram Kunwar sing, Raja Nahir Singh, Rao Tula Ram were offering their sacrifices.
The rebellion was also characterized by military revolts by sepoys of the Bengal Presidency army; in which Mangal Panday played a crucial role. The presidency consisted of Bengal, Bihar, and Uttar Pradesh. However, most rebel soldiers were from the Uttar Pradesh region, and, in particular, from the Northwest Provinces Oudh, and many came from higher cast.
The sepoys were a combination of Muslim and Hindu soldiers. The final spark was provided by the controversy over the new Pattern 1853 Enfield rifle. To load the new rifle, the sepoys had to bite the cartridge open. It was believed that the paper cartridges that were standard issue with the rifle were greased with lard (pork fat) which was regarded as unclean by Muslims, or tallow (beef fat), regarded as a sin to Hindus.
The rebellion is also known as India's First War of Independence,
SHARJEEL.

Wednesday, August 12, 2009

Sarfaroshi ki Tamanna ..


It is the irony of our country that we remember our country , our freedom fighters our freedom movement only at the time of 15th Aug. or 26th Jan.
We can easily find many Indians who even don’t know the full name of Mahatma Gandhi. Rests freedom fighters are too far.

Friends I am trying to bring the life of some of our freedom movement Heroes who had been forgotten. Let’s know to those because of whom we are living happily in an independent nation….

Pandit Ram Prasad Bismil was one of the famous freedom fighter who was involved in the historic Kakori train robbery. He was born in 1897 at Shahjahanpur, Uttar Pradesh. His team members consisted of great freedom fighters like Ashfaqulla Khan, Chandrasekhar Azad, Bhagawati Charan, Rajguru and many more

Ramaprasad learnt Hindi from his father and was sent to learn Urdu from Moulvi.
He was a great poet and Bismil was his pen name, several inspiring patriotic verses are attributed him, of which Sarfaroshi ki Tamanna is the most well known. All of his poems have the intense patriotic feeling.

On 9th August, 1925, Ram Prasad Bismil along with his fellow followers looted the money of the British government from the train while it was passing through Kakori, Lucknow. Except Chandrashekhar Azad, all other members of the group were arrested. Ram Prasad Bismil along with others was given capital punishment. This great freedom fighter of India was executed on 19th December, 1927.

lets have read this heart touching poem by him.

SARFAROSHI KI TAMANNA

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है

(ऐ वतन,) करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बातचीत, देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है

ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत, मैं तेरे ऊपर निसार,

अब तेरी हिम्मत का चरचा ग़ैर की महफ़िल में है

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
वक़्त आने पर बता देंगे तुझे, ए आसमान, हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है

खेंच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उमीद,आशिकों का आज जमघट कूचा-ए-क़ातिल में है

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
है लिए हथियार दुश्मन ताक में बैठा उधर,और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर।

ख़ून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्क़िल में है, सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
हाथ, जिन में है जूनून, कटते नही तलवार से,सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से।

और भड़केगा जो शोला सा हमारे दिल में है, सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हम तो घर से ही थे निकले बाँधकर सर पर कफ़न, जाँ हथेली पर लिए लो बढ चले हैं ये कदम।

ज़िंदगी तो अपनी मॆहमाँ मौत की महफ़िल में है, सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


यूँ खड़ा मक़्तल में क़ातिल कह रहा है बार-बार, क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है?

दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्कलाब,होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको न आज।

दूर रह पाए जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है, सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमे न हो ख़ून-ए-जुनून क्या लड़े तूफ़ान से जो कश्ती-ए-साहिल में है सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है

Now lets read the abridged version of this poem that was recited by Piyush Mishra in the 2009 movie GULAL. It is also an satire on today's scenario.


सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है , देखना हे ज़ोर कितना बाजू ऐ कातिल में हे

वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमां, हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है

ओ रे बिस्मिल काश आते आज तुम हिन्दोस्तां, देखते कि मुल्क सारा यूँ टशन में, थ्रिल में हे

आज का लड़का तो कहता हम तो बिस्मिल थक गए, अपनी आज़ादी तो भैया लौंडिया के तिल में है

आज के जलसों में बिस्मिल एक गूंगा गा रहा, और बहरों का वो रेला नाचता महफ़िल में है

हाथ की खादी बनाने का ज़माना लद गया, आज तो चड्डी भी सिलती इंग्लिसों की मिल में है

वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमां, हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए क़ातिल में है

Saturday, August 1, 2009

नाम था गौरी

था अँधेरा बहुत चाँद भी गुम था
हम थे तन्हाई थी और कोई न था
अपनी परेशानियों से दोस्ती हो गई थी
वो ग़म ही तो थे के जिनका साथ था
ऐसे में हुई छम देखा तो कोई आया नाम था गौरी

मासूम सा चेहरा झील सी आँखे
होठ गुलाब की पंखुडी जिस्म संगेमरमर
फ़रिश्ता कोई न देखा था अहसास हुआ था
अगर होता कोई फ़रिश्ता तो ऐसा ही होता
उसकी सुन्दरता में सब खो गया था
हम भी अपने आप को भूल गए थे
ऐसे में हुई छम देखा तो कोई आया नाम था गौरी

यह शायद सपना हो मेरा सोच के हमने उसको छुआ
मेने चुने से जेसे वो जाग गई थी
फिर जो देखी उसकी आँखे दर्द ही दर्द दिखा था उनमे
उसके होंठो से निकली इक दर्द भरी आह
पास न आओ छुओ नहीं में पाक नहीं हु
ऐसे में हुई छम देखा तो कोई आया नाम था गौरी

कुछ पल के लिए में झिझक गया था
उसकी सुन्दरता का जादू गुम हो गया
वो मायूस हो गई शायद
उसको भी मेरे छूने की आस लगी थी
फिर जब देखा उसकी आँखों में
शिव सी सुन्दरता और पाकी साफ़ नज़र आई
की मेने पूरी हसरत उसको छूने की
उसने भी मेरे अहसास को था खूब सराहा
ऐसे में हुई छम देखा तो कोई आया नाम था गौरी



बीत गए सरे पल इक दूजे की बाहों में
कब ले गई नींद मुझे मालूम नहीं था
आँख खुली तो देखा में फिर तनहा था
मेरे सुने बिस्तर में इक पायल पड़ी थी
जो करती थी छम और कोई आता था नाम था गौरी

Sunday, July 26, 2009

Ameer Khusro : Hindi poems

Today I got an old book of Ameer khusro from a Kabadiwala in just Rs.10/ when one of my neighbors was selling out his old news paper ‘Raddi’ to him. It was amazing to read Khusro and I bought some of his work for u….


ख़ुसरो दरिया प्रेम का, उलटी वा की धार,
जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार.

Translation
Oh Khusrau, the river of love
Runs in strange directions.
One who jumps into it drowns,
And one who drowns, gets across
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छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके
प्रेम भटी का मदवा पिलाइके
मतवारी कर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
गोरी गोरी बईयाँ, हरी हरी चूड़ियाँ
बईयाँ पकड़ धर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
बल बल जाऊं मैं तोरे रंग रजवा
अपनी सी रंग दीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
खुसरो निजाम के बल बल जाए
मोहे सुहागन कीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके

Translation
You've taken away my looks, my identity, by just a glance.
By making me drink the wine of love-potion,
You've intoxicated me by just a glance;
My fair, delicate wrists with green bangles in them,
Have been held tightly by you with just a glance.
I give my life to you, Oh my cloth-dyer,
You've dyed me in yourself, by just a glance.
I give my whole life to you Oh, Nijam,
You've made me your bride, by just a glance.

Tuesday, July 7, 2009

METRO BUS SERVICES

METRO BUS SERVICES

There was a news that in few months Bhopal with some major cities of Madhya Pradesh will enjoy the pleasure ride of Metro Bus service which include Volvo, TATA, type of buses.
It is really good news but some questions rise in my mind with this news:
The same zeal we had when we got City Links Buses, but now we can see the dilapidated condition of those buses, who is responsible for that? It is a clear loss of public funds.
No doubt Star buses were a boon for our city especially for the girls’ commuter who faced indecent atmosphere in mini buses everyday, but by the shutdown of star buses on some rote again they compel to face indecency.
I really feel apathy for our law system, only few miscreants has damaged Star Buses and till today our police couldn’t get a single clue of them.
In such an unsafe scenario is it good to start an expensive project of Metro Bus services?
Who will take the responsibility for the safety of these buses?
One more reason is that the Conditions of our city roads are horrible especially down towns, road side encroachments is on high, shoppers capture all footpath. It is not easy for such kind of expensive buses to travel smoothly in these traffic pack roads with pot holes.
Before starting such a mega project of Metro Buses city administration should solve these basic problems on priority.

Sharjeel.