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Wednesday, August 8, 2012

चीटिंग

समय के साथ हर चीज़ बदल जाती है खास तोर से आपके अपनों का आपके साथ रखरखाव , वर्मा जी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ , रिटायर होने के बाद जो दो लाख रुपया मिला वर्मा जी ने चारो लड़को में बराबर बाट दिया ये सोच के , के उनके बाद ये सब उनके लड़को का ही तो होगा , मंझले बेटे की ज़िद पे मकान के भी चार हिस्से कर दिए और वसीयत भी बनवा दी , पत्नी सुधा देवी ने समझाया भी था के इतनी जल्द बाज़ी ठीक नहीं पर वर्मा जी ने एक न सुनी,


अब जेसे जेसे दिन गुज़र रहे थे चारो बेटो और बहुओ का असली रंग सामने आरहा था , 40 साल तक वर्मा जी और उनकी पत्नी सुबह सूरज निकलने से पहले उठ जाया करते थे 8 बजे ठीक वर्मा जी को ऑफिस के लिए बस पकडनी होती थी , दोनों अक्सर बाते करते थे के रिटायर्मेंट के बाद आराम से 9 बजे उठा करेंगे और चाय की चुस्की के साथ अखबार पड़ा करेंगे .

पर ये शायद उनके भाग्य में न था , वर्मा जी की पत्नी की नई ड्यूटी ६ पोता पोती को सुबह स्कूल के लिए तेयार करना और फिर उनके लिए नाश्ता बनाना था ,पोता पोती के स्कूल जाने के बाद चारो लडको और बहुओ के लिए भी नाश्ता बनाना दोपहर का खाना बनाना और फिर रात का खाना बनाना और कभी अगर काम वाली बाई ने छुट्टी कर ली जो की वो अक्सर करती थी तो बर्तन धुलाई और झाड़ू पोचा भी करना पड़ता था .

वर्मा जी के हिस्से में पोता पोती को स्कूल लाना लेजाना , सब्जी भाजी लाना और चक्की से आनाज पिसवाना और कभी अगर गेस एजेंसी की गाडी समय पे गेस न लाये जो की अक्सर होता था तो साइकिल से गेस सिलेंडर लाना.

वेसे वर्मा जी को खुद की कोई चिंता न था लेकिन पत्नी की हालत देख के कभी कभी उनकी आँखों में आंसू आ जाते थे , उनकी समझ में बस ये नहीं आता था के आखिर 3 महीने में ये सब केसे बदल गया अभी 3 महीने पहले तक तो चारो बेटे और बहु कितने आज्ञाकारी थे अचानक केसे बदल गए , समझ में बस यही आया के अपना सब कुछ अगर अपनों के नाम करो तो अपनों को पराया होने में ज़यादा समय नहीं लगता.

जेसे तेसे 2 महीने और गुज़रे हालत बद से बदतर होते जारहे थे

एक दिन वर्मा जी ने अपने बेटो से वेष्णो देवी के दर्शन की इच्छा जाहिर की तो तीसरे नंबर के बेटे ने कहा "आप बस 1 महिना और इंतज़ार करो उसके बाद आपको हरिद्वार दर्शन करवाएंगे "

असलियत यह थी के वर्मा जी के सबसे छोटे बेटे का दोस्त NGO में काम करता था उस NGO का हरिद्वार में एक वृद्ध आश्रम था जहा उसने अपने पिता को भी रखवाया था , एक महीने बाद वहा नई भर्ती होने वाली थी वहा वर्मा जी और उनकी पत्नी के लिए लड़कों ने पहले से ही अप्लिकेशन दे रखी थी और मकान के लिए चारो ने एक बिल्डर से बात की थी जो वहा काम्प्लेक्स बनाना चाहता था जिससे चारो को मोटी रकम मिलती .

फिर एक दिन सुबह पासपोर्ट आफिस से एक आदमी वर्मा जी और उनकी पत्नी की जानकारी लेने आया , बेटे बहुओ को बड़ी हेरानी हुई , वर्मा जी ने बताया के कई महीनो पहले उन्होंने उनका और उनकी पत्नी का पासपोर्ट बनवाने के लिए आवेदन दिया था ये सोच के के रिटायर्मेंट के बाद पत्नी को कही घुमाने लेके जायेंगे , ये सुनते ही बेटे और बहुओ की हसी न रुकी , अपनी हसी रोकते हुए बड़ी बहु ने बोला अरे पापाजी अब आपकी उम्र तीर्थ यात्रा पे जाने की है न की विदेश यात्रा पे जाने की, सब फिर से हसने लगे , फिर मंझले बेटे ने पासपोर्ट आफिस वालो से बोला " अब आप आये हो तो जानकारी तो ले ही लो , इनका अगर पासपोर्ट बन गया तो हम लोगो का भी पासपोर्ट आराम से बन जायेगा "

निराश मन के साथ वर्मा जी ने सारी जानकारी दी .

जेसे जेसे दिन गुज़र रहे थे बेटे बहु की बदतमीज़ी बढती जा रही थी , छोटी छोटी गलतियों पे अब चारो बहु गलियों का भी इस्तेमाल करने लगी थी

फिर एक दिन डोर बेल बजी किसी ने वर्मा जी का पुछा , वर्मा जी ने बाहर जाके उस आदमी से बात की थोड़ी देर में वो आदमी चला गया , वर्मा जी जब वापस अन्दर आये तो चेहरे पे कुछ चिंता के भाव थे

छोटी बहु ने पुछा "कोन था " कोई नहीं बहु मेरे साथ ऑफिस में काम करने वाला पुराना दोस्त था यह कहते हुए वर्मा जी कमरे में चले गए .... वो पूरा दिन वर्मा जी किसी चिंता में डूबे रहे , रात को खाने के समय छोटे बेटे ने ने बताया के हरिद्वार से उसके दोस्त का फ़ोन आया था माँ पापा के लिए वहा सारा इंतज़ाम हो गया है अगले हफ्ते जाना होगा सभी लड़के और बहुओ ने एक दुसरे की आँखों में देखा ,दिल ही दिल में सब मुस्कुरा रहे थे ,

उस रात वर्मा जी धीरे धीरे अपनी पत्नी से बहुत देर तक बात करते रहे .

सुबह दूध वाले ने डोर बेल बजा बजा के पुरे घर को उठा दिया ... बड़ी बहु तुनक के अपने कमरे से निकलके बोली "माँ पापा आप लोगो को डोर बेल सुने नहीं देती क्या " लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया ... मंझले बेटे ने वर्मा जी के कमरे का दरवाज़ा खट खटाया ... दरवाज़ा खुला हुआ था , अन्दर देखा तो कोई नहीं था , किसी को कुछ समझ नहीं आया के आखिर माँ पापा आज सुबह से ही कहा चले गए

बड़ा बेटा झल्लाया "इनलोगों को अगर मंदिर जाना था तो पहले दूध लेना चाहिए था .... आने दो आज सारी पूजा पाठ करवाता हु".

दोपहर हुई शाम हुई रात आगई पर वर्मा जी और उनकी पत्नी वापस घर न आये सभी लड़के और बहुओ में उनके घर वापस न आने की चिंता से ज़यादा जो उस दिन काम करना पड़ा उसका गुस्सा था ,

आखिर दोनों चले कहा गए ...? , कही उन्हें हरिद्वार के प्लान का पता तो नहीं चल गया...? गुमशुदगी की रिपोर्ट करवा दे क्या ... ? कही कुछ चोरी करके तो नहीं ले गए....?

इन्ही सब आवाजों से उस रात सारा घर गूंजता रहा .

दुसरे दिन सुबह फिर दूध वाले ने घंटी बजाई काफी देर घंटी बाजके वो चला गया ....

फिर 9 बजे किसी ने घंटी बजाई काफी देर घंटी बजने के बाद जोर जोर से दरवाज़ा खटखटाया जिससे सभी की नींद खुल गई सब धीरे धीरे अपने कमरों से निकले छोटे बेटे ने जाके दरवाज़ा खोला , दरवाज़ा खुलते ही सबके पेरो के निचे से ज़मीन खिसक गई ..... दरवाज़े पे वर्मा जी नया सूट पहने हुए खड़े थे साथ में उनकी श्रीमती थी उन्होंने ने भी नई साड़ी पहनी हुई थी पीछे एक वकील और दो पुलिस वाले थे ... वर्मा जी और उनकी पत्नी के हाथो में बहुत सा सामान था लगता था जेसे बहुत शोपिंग की है

बड़े बेटे की आवाज़ निकली " पापा जी ये सब क्या है , और कहा चले गए थे आप लोग ..जानते है हम सब कितना परेशान हो रहे थे "

वर्मा जी ने मुस्कुराते हुए वकील की तरफ देखा , वकील ने बोलना शुरू किया " देखिये जी सबसे पहले तो आप सब खड़े मत रहो बेठ जाओ क्युकी अब जो में आप लोगो को बताने जा रहा हु वो सुनके आपको शायद चक्कर आजाये ,

ये जो मकान की वसीयत थी वो नकली थी असली वसीयत के हिसाब से माकन के मालिक वर्मा जी ही है उनके बाद ये माकन आपकी पूज्य माता जी का होगा और उनके बाद ये माकन अनाथ आश्रम को दान हो जायेगा फिलहाल आप सब लोग इस माकन में किरायेदार की हेसियत से हो इसलिए हर परिवार को 3000 रुपया महिना किराया देना होगा अगर यहाँ रहना हो तो

इसके बाद वर्मा जी अपना चश्मा ठीक करते हुए बोले '



मुझे रिटायर्मेंट के बाद 2 लाख नहीं बल्कि 10 लाख मिले थे पर मेने तुम लोगो को 2 लाख ही बताये 8 लाख मेरे दूसरे अकाउंट में है असल में मेरे रिटायर्मेंट के बाद से अब तक का जो समय गुज़रा वो तुम सबकी परीक्षा का समय था और कल रिज़ल्ट का दिन था , रिज़ल्ट में तुम सब फेल हो गए , फिर वो अपनी छोटी बहु को देखके बोले कल मुझसे कोई दोस्त मिलने नहीं आया था बल्कि डाकिया था जो हमारा पासपोर्ट लाया था

कल में अपनी धर्मपत्नी के साथ विदेश यात्रा पे जा रहा हु और 2 महीने बाद जब हम वापस आये तो 50000 जो मेने तुम चारो को दिए है वो मुझे वापस कर देना और उसके साथ 2 महीने का मकान का किराया भी यानि तुम चारो मुझे 56000 - 56000 दोगे दो महीने बाद और अगर ऐसा न हुआ तो तो तुम लोगो का सारा सामान तो यही रहेगा पर तुम लोग सड़क पे होगे , और अगर सब ठीक से हुआ तो ठीक वरना ये पुलिस वाले धक्के मारके तुम्हे यहाँ से निकालेंगे

और हा तुम लोगो ने जो हमारे लिए हरिद्वार का प्लान बनाया था वो मुझे तब ही पता चल गया था जब रात को तुम लोग इस बारे में बात कर रहे थे, फिर वर्मा जी ने अपनी श्रीमती को मुस्कुराके देखा और बोला " खेर कोई बात नहीं हरिद्वार जाना सबके भाग्य में नहीं होता "

चलो अब हम यहाँ से चलते है आज रात में अपनी पत्नी के साथ ५ स्टार होटल में रुकुंगा फिर सुबह हमारी फिलाईट भी है ... हरिद्वार की नहीं विदेश यात्रा की " यह कहते हुए वर्मा जी पत्नी के साथ वापस चले गए

चारो लडको और बहुओ के चेहरे का रंग उड़ चुका था , किसी ने एक धीमी आवाज़ में बस यही कहा " माँ और पापा जी ने हमारे साथ चीटिंग की "

Sunday, July 1, 2012

Miss U Maa....

Maa how r u, its five years I haven’t see u and babu ji … really missing u. Sapna also miss u a lot , mom pease come to me for few days , I m sending u rail ticket , ok Maa I m waiting for u Love u Maa Call disconect .. Next call : Hello doctor, no need to arrange any expensive nurse for my wife, my mom is coming.

appoitment: अपोइन्टमेंट

मुरारी बाबू के कदमो की रफ़्तार अब और तेज़ हो गई थी पीछे आने वाले दोनों आदमियों ने भी अपनी रफ़्तार तेज़ कर दी थी मुरारी बाबू कुछ समझ नहीं पा रहे थे के आखिर ये गुंडे बदमाशों की तरह दिखने वाले आज ऑफिस से ही उनके पीछे क्यों है , वेसे कल भी ऑफिस ख़त्म होने के बाद उनकी नज़र इन दोनों आदमियों पे पड़ी थी, लेकिन सरकारी दफ्तर में तो लोगो का आना जाना लगा ही रहता है और वो भी रजिस्ट्री ऑफिस जेसा दफ्तर जहा रोजाना लाखो की रिशवत का आवन होता है , इसलिए वहा इन जेसे लोगो का होना आम बात है वेसे ओहदा तो मुरारी बाबू का भी कोई कम न था कई बार इन जेसे लोगो ने उन्हें लालच की पुडिया देने की कोशिश की थी लेकिन पिताजी की नसीहत का असर था या हिम्मत की कमी जो वो आज तक रिशवत की गंदगी से बचे हुए थे क्युकी भगवान की किरपा से घर का भरण पोषण तो उनकी पगार से ही हो जाता था , बड़ी बेटी की शादी हो ही चुकी थी बस अब बड़ा बेटा बिट्टू और छोटी बेटी गुडिया की शादी ही बची है , रिटायरमेंट में अभी 4-5 साल बाकि है और गुडिया को शादी के लिए अभी 2-3 साल है , बिट्टू की पढाई तो हो ही चुकी है हा बस काफी कोशिशो के बाद भी बेचारे को सरकारी नोकरी नहीं मिल पाई , पिछले 2 साल से प्राइवेट नोकरी कर रहा था फिर भी ठीक है कम से कम अपना खर्च तो चला ही लेता है अपनी नोकरी से . हा बस बेचारा अपनी दोस्त सपना से शादी नहीं कर पा रहा है , सपना के पिता को दामाद सरकारी नोकर ही चाहिए और वो क्यों न चाहे आखिर सपना उनकी इकलोती बेटी जो है और वो खुद भी 'ए क्लास अफसर जो है , इसीलिए तो उन्होंने बिट्टू को 1 साल का समय दिया था के वो इस एक साल में कोई सरकारी नोकरी हासिल कर ले या फिर सपना को भूल जाये . इन्ही सब खयालों में मुरारी बाबू कब सुनी सड़क तक आ गये उन्हें पता ही नहीं चला बस थोड़ी ही देर में घर भी आजायेगा , पीछे मुड के देखा तो वो बदमाश भी दिखाई नहीं दिए अब जाके उनकी जान में जान आई लेकिन घबराहट की वजह से पसीना रुकने का नाम नहीं ले रहा था, बार बार पीछे मुड के देख रहे थे के अचानक पेड़ की आड़ से दोनो बदमाश निकले एक बदमाश के हाथ में कुछ चमक रहा था मुरारी बाबू कुछ समझ पाते तब तक वो चमकदार चीज़ बड़े से छुरे के रूप में मुरारी बाबू के पेट में घुस चूका था एक के बाद एक कई वार करके दोनों बदमाश भाग निकले मुरारी बाबू बस एक चीख ही निकाल सके . अगले दिन मुरारी बाबू के क़त्ल की खबर पूरे शहर में फेल गई थी उनके मोहल्ले में तो सन्नाटा पसरा हुआ था , अंतिम यात्रा में सारा मोहल्ला और ऑफिस के सभी लोग शामिल हुए अगले दिन ऑफिस के बड़े बाबू मुरारी बाबू के घर आके उनकी विधवा से बोले " भाभी जी नियम के अनुसार मुरारी बाबू की अकस्मात् मृत्यु की वजह से उनकी नोकरी अब उनके लड़के को मिल सकती है , अगले सोमवार बिट्टू को उसके सारे सर्टिफिकेट लेके दफ्तर पंहुचा देना" भगवान् एक रास्ता बंद करता है तो दूसरा खोल देता है ये सोच के मुरारी बाबू की पत्नी के आँखों में आंसू आगये कुछ दिनों बाद रात के अँधेरे में गली के नुक्कड़ पे बिट्टू से मिलने २ आदमी आये एक ने बदमाशों सी कड़कड़ी आवाज़ में बिट्टू से बोला : तुम्हारा काम हो गया तुम्हे अपोटमेंट भी मिल गया है अब हमारे पैसे निकालो बिट्टू : अरे अपोटमेंट नहीं अपोइन्टमेंट और मेने आप लोगों को यहाँ आने को माना किया था न , बाकि के पैसे अपोइन्टमेंट लैटर मिलते ही में आपको दे दूंगा आदमी : देखो बिट्टू बाबू अपोटमेंट लैटर हम कुछ नहीं जानते तुम बस बाकि के पैसो का इंतज़ाम जल्दी कर लो अगर कोई चालाकी की
 कोशिश की तो सबको पता चल जायेगा के सरकारी नोकरी के लालच में तुमने अपने पिता को ... बिट्टू उन दोनों की बात बीच में कटते हुए बोला 'बकवास बंद करो 4 दिन में तुम्हे तुम्हारे बाकि पैसे मिल जायेंगे, अब जाओ यहाँ से' ..

Sunday, August 15, 2010

'चवन्नी'

दिवाली पे इतनी सर्दी शायद ही पहले कभी पड़ी हो . उस चुभने वाली सर्दी ने दिवाली का सारा मज़ा ही बिगड़ दिया था . हर साल की तरह इस साल भी तिब्बती लोग अपने गर्म ऊनी कपड़ो की दुकाने सजा चुके थे. जेसे जेसे सर्दी बड़ती थी इन तिबत्तियो के चेहरों में ख़ुशी बड़ती जाती थी. तिबत्तियो के साथ सामने के फूटपाथ पे रहने वाली बुडी भिखारन के लिए भी यह सुनेहरा मोका होता था , इन दुकानों की वजह से सड़क पे काफी भीड़ भाड़ रहती हे, वही बेठे बेठे ही उसके भीख का कोटा पूरा हो जाता था यहाँ वहा भटकने की ज़रुरत नहीं पड़ती थी.
लेकिन फिर भी उसके सर्दी से फटे हुए झुर्रीदार चेहरे पे गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था , वजह सिर्फ एक ही 'चवन्नी' .
वेसे बस्ती वाले और फुटपाथ पे से रोज़ गुजरने वाले चवन्नी को बुडिया की नाती पोती ही समझते थे लेकिन यह बात सिर्फ बुडिया ही जानती थी के चवन्नी से उसका कोई खून का रिश्ता नहीं हे बलकि वो तो कभी कभी उस मनहूस दिन को कोसती हे जिस दिन यह चवन्नी उसके गले पड़ गई थी.
उस रात को 5-6 साल हो चुके थे जिस दिन एक बड़ी सी गाड़ी से कोई लग भाग दो- तीन साल की बच्ची को सोती हुई हालत में फुटपाथ पे छोड़ गया था. सुबह लोगो की चहल पहल से बच्ची की नींद खुली तो उसने रोना शुरू कर दिया , अपनी बुडी आँखों से बुडिया ने सारा माजरा देखा था लेकिन उसे क्या जिसकी बला हो वो जाने, लेकिन बुडिया की चिंता तब बड़ी जब बच्ची ने बुडिया के झोपडे के सामने आके और तेज़ रोना शुरू करदिया. पहले तो बुडिया ने कई बार धुतकारा लेकिन फिर शायद वो भुखी हो यह जान के बासी पाव उसे दे दिया और खुद काम पे निकल गई .
शाम को जब बुडिया वापस लोटी तो देखा वो बच्ची उसी के झोपडे में सो रही थी, उसकी अध् खुली मुठ्ठी में एक चवन्नी नज़र आ रही थी , शायद किसी ने भीख में दी थी, बस उसी दिन से उसका नाम चवन्नी पड़ गया और वो बुडिया के गले पड़ गई .
वेसे बुडिया ने चवन्नी से छुटकारा पाने के लिए एडी चोटीi का जोर लगाया लेकिन उसकी सारी कोशिश नअकाम रही.
पंडू हवलदार को सारी कहानी सुनाई लेकिन उसके कान पे जू तक न रेंगी.
हिम्मत जुटा के कोतवाली पोहची तो बड़े साब ने यह कह के "हमारे पास बच्ची गुम होने की कोई रिपोट नहीं हे"
उसे धुत्कार के भगा दिया.
लल्लू पनवाडी ने बताया नए मोहल्ले में मंगत भाई नाम का एक आदमी आश्रम चलता हे सो वो उसके पास पहुच गई,मंगत भाई ने उसकी सारी कहानी सुनी और उसपे विशवास भी किया, मंगत भाई ने बड़े प्यार से बच्ची के सर पे हाथ फेरा और उसे गोर से देखा , बुडिया को एक सूती साडी भी दी नोकर को भेजके बुडिया के लिए चाय भी मंगवाई , सच मुच मंगत भाई बहुत भले इंसान हे सोचते हुए बुडिया ने चाय की चुसकिया ली, बरसात के मोसम में गरमा गर्म चाय की बात ही कुछ और थी , बच्ची बुडिया और मंगत भाई दोनों को अजीब नजरो रे देख रही थी , बुडिया ने उसपे एक नज़र डाली और और मंगत भाई का धन्यवाद करते हुए वहा से चल दी , बहार सड़क पे हलकी बूंदा बंदी शुरू हो गई थी , बुडिया ने एक बार फिर पलट के देखा तो आश्रम की गेलरी में से बच्ची उसी को देख रही थी , तभी अचानक बुडिया को याद आया के मंगत भाई ने जो साडी दी थी वो तो उसने आश्रम में ही छोड़ दी बिजली की तेरह बुडिया आश्रम की और बड़ी बारिश की वजह से अँधेरा हो गया था आश्रम की शायद बत्ती भी गुल हो गई थी , बुडिया की साडी वही राखी थी जहा वो बेठी थी बहार गेलरी में बच्ची बारिश की बुँदे देख रही थी मंगत भाई शायद अन्दर चले गए थे , साडी उठा के बुडिया वापस पलटी ही थी के उसके कानो में मंगत भाई की आवाज पड़ी, वो शायद किसी से टेलीफोन पे बात कर रहे थे " आज ही आई हे , शकल सूरत से अच्छे घर की लगती हे , नहीं नहीं तीस हज़ार से एक भी पैसा कम नहीं , मुझे क्या पता नहीं के तुम इसके कितने दाम बनाओगे"
फोन काटने के बाद मंगत भाई गेलरी में आये तो बच्ची गायब थी.
ऑटो रिक्शा बुडिया की झोपडी के सामने ही रुका , पेसे देने के बाद बुडिया बच्ची के साथ नीचे उतरी आज शायद जीवन में पहली बार बुडिया ऑटो रिक्शा में बेठी थी आखिर जल्द से जल्द मंगत भाई के आश्रम से दूर जो जाना था
बच्ची की तरफ देखा तो बुडिया को समझ नहीं आरहा था के वो क्या करे.
बुडिया फुटपाथ पे बने अपने झोपडे के सामने बेठ गई , बच्ची भी उसके पास बेठ गई , थोडी ही देर में बुडिया ने बच्ची को अपने साथ रखने का मन बना लिया , इस ह्रदय परिवर्तन का कारण था के लोग बच्ची को भी भीक देके जा रहे थे. धीरे धीरे चवन्नी के अन्दर वो सभी गुण आ गये जो एक भिखारन में होने चाहिए.
लेकिन आज सड़क पे इतनी आवक जावक हे मगर वो करमजली चवन्नी न जाने कहा मर गई, हरामखोर को रात भर भूखा रखूंगी तो सारी अकल ठिकाने आ जायेगी बुदिया बड़बडाये जा रही थी .
अभी अगर मेरे साथ होती तो न जाने कितनी भीख जमा हो जाती के रात को कलारी से अंग्रेजी का पव्वा और मद्रासी की बची हुई मछली.... सोच के बुडिया के पोपले मुह में पानी आगया लेकिन दुसरे ही पल जेसे ही उसकी नज़र लंगडे भिखारी पे पड़ी बुडिया तिलमिला उठी , चवन्नी के न होने की वजह से आज तो लंगडे को भी बहुत भीख मिल रही हे , आखिर बुडिया से बर्दाश्त न हुआ " ऐ लंगडे तुझे कितनी बार मना किया हे फुटपाथ के इस तरफ न आया कर , तेरी समझ में नहीं आता , दूसरी बार यहाँ दिखा तो दूसरी टांग भी तोड़ दूंगी " अपना डंडा हवा में उठा ते हुए बुडिया चिल्लाई , "जाता हु जाता हु ठठरी पे बेठी हे और बाते बड़ी बड़ी , कहा लेके जायेगी इतना माल " धीरे धीरे बडबडाते हुए लंगडा सड़क के दूसरी तरफ पहुच गया.
जेसे जेसे समय गुज़र रहा था सर्दी बढती जा रही थी . गर्मियों में रह रह कर बुडिया जिस सूरज को कोसती थी आज उसी को बार बार याद करके थोडी गर्मी महसूस कर रही थी. आज तो जलाने को भी कुछ न बचा था जो पुराने टायर थे वो तो कल रात ही जला दिए थे अब तो एक ही चारा था , चवन्नी आये तो उसे भेज के कुछ कचरा जमा किया जाये जलाने के लिए. एक तो सर्दी ने परेशान किया हे उपर से आज पहली बार इतनी देर के लिए चवन्नी गायब हुई थी.
चवन्नी के बारे में सोच सोच के आज बुडिया का मन भी भीक मांगने में नहीं लग रहा था. थोडी थोडी देर में वो बडबडाने लगती थी 'अच्चा हे निगोडी मर जाये तो पिंड छुटे.
शाम का समय हो रहा था रास्ते पे लोगो की आवक भी कम हो गई थी , सर्दी की वजह से आज नुक्कड़ का चाये वाला भी अपनी गुमठी जल्दी बंद कर गया था , कुछ दूर पे आतिशबाजी की दुकाने लगी हुई हे वह काफी भीड़ थी , आज दिवाली जो हे पर सर्दी की वजह से बुडिया की वहा जाने की हिम्मत न हो रही थी .
वेसे बुडिया को ठीक से याद तो नहीं पर 70-75 सावन तो देख ही चुकी थी पर इतनी सर्दी उसने आज तक न देखि थी .
पठाखे फूटने की आवाजे आना शुरू हो गई थी , शाम ढलने लगी थी , अब बुडिया को चवन्नी की ज़यादा चिंता होने लगी थी , आखिर उसने हिम्मत जुटा के चवन्नी को ढूँढने जाने का मन बना ही लिया , अपनी गठरी को बगल में दबाके, डंडा उठाके बुडिया अभी कुछ कदम ही चली थी के दूर से किसी को आता देख रुक गई और वापस अपनी झोपडे में आगई, एक ही पल में बुडिया के चेहरे से चिंता के भाव ख़त्म हो गए थे लेकिन गुस्सा बाद गया था.
लडखडाती चाल के साथ एक लड़की झोपडी की तरफ चली आरही थी , लगभग 8-९ साल की लड़की जिस्म पे एक पुरानी फटी हुई फ्राक और सलवार जिनका रंग पहचानना भी मुश्किल था सर पे एक कपडा ऐसे बंधा हुए था के दोनों कान छुप जाये सर्दी से बचने के लिए, पेरो में दो अलग तरह की चप्पल थी, चेहरे पे मासूमियत के साथ थकान साफ़ नज़र आरही थी उसकी चाल से ऐसा लग रहा था के पेरो में कोई ज़ख्म हो जिसकी वजह से चलने में दिक्कत हो रही थी. जेसे ही वो झोपडे के सामने पोहची सबसे पहले उसका सामना बुडिया की कडकडाती आवाज़ के साथ हुआ " कहा मरने गई थी हरामखोर, बाहर निकल जा आज के बाद अपनी मनहूस शकल मत दिखाना"
बुडिया की डाट और सर्दी की कपकपाहट के साथ चवन्नी के आंसू बहने लगे.
"अब कुछ बोलेगी भी या ज़बान बेच आई हे , बोल कहा मर रही थी और ये हाथ में क्या छुपा रही हे"
डर की वजह से चवन्नी ने हाथ आगे कर दिया उसके हाथ में एक दस का नोट था .
बुडिया फिर गरजी 'कहा से आया ये दस का नोट'
अपने आंसू पोछते हुए चवन्नी ने बताया 'अम्मा कल रात तुम सर्दी की वजह से बहुत ख़ास रही थी इसलिए में बस्ती में तुम्हारे किये गरम कपडा मांगने गई थी, मेने बहुत लोगो से माँगा पर किसी ने नहीं दिया , फिर जब में वापस आरही थी तो नुक्कड़ पे एक आदमी ने मुझसे पूछा क्या चाहिए मेने कहा गरम कपडा तो वो बोला मेरे साथ चलो में देता हु , वो मुझे बस्ती के पीछे एक घर में लेके गए रास्ते में उन्होंने मुझे एक चाकलेट भी दी ,
पर अम्मा वो बहुत खराब आदमी था, रोते हुए चवन्नी बोली , पता हे अम्मा उसने मेरी फ्राक ....... दिवाली के पठाखो की आवाज़ तेज़ हो गई , थोडी देर बाद पठाखो की आवाज़ धीमे हुई ...... बुडिया अपने झोपडे से बाहर निकल कर बस्ती की तरफ मुह करके गन्दी गालिया बकने लगी

बदलाव :

बदलाव

वृद्ध आश्रम की वार्डेन ने तेज आवाज़ लगाई "शोभा दीदी जल्दी आओ आपके बेटे का फ़ोन आया है" शोभा को तो अपने कानो पे विश्वास ही नहीं हो रहा था के उसका बेटा उसे कभी फ़ोन भी कर सकता है . पति के स्वर्गवास के बाद कुछ दिन तो सब ठीक चला लेकिन फिर बेटा कुमार पुश्तेनी मकान अपने नाम करने की जिद्द करने लगा सो शोभा ने वो भी कर दिया बस थोड़े ही दिन में सब बदल गया इकलोता बेटा और बहु के व्यवहार में बहुत बदलाव आ गया , अब छोटी छोटी बातो के लिए उसे अपने बेटे और बहु की डाट सुन्नी पड़ती फिर कुछ समय बाद बहु ने बेटे को वृद्ध आश्रम का पता बता दिया और तब से शोभा ने इस आश्रम को ही अपना संसार बना लिया था पहले साल तो एक बार बेटा विदेश जाने से पहले मिलने भी आया था लेकिन पिछले पांच सालो से उसने कोई खबर ही नहीं ली थी.
बेटे के फ़ोन आने की ख़ुशी ने उसे मानो पागल सा कर दिया था नंगे पैर ही भागती हुई वार्डेन के कमरे पे पहुची और झट से फ़ोन उठा लिया 'हेल्लो' हेल्लो माँ में कुमार बोल रहा हु , केसी हो तुम ! सालो बाद बेटे की आवाज़ कान में पड़ते ही आँखों से आंसुओ की लड़ी बहने लगी
'में ठीक हु तू केसा है ' में भी ठीक हु माँ , माँ में और सपना चाहते हे की अब तू हमारे साथ ही रहे , हमें तेरी बहुत चिंता होती हे , तू सारी पुरानी बाते भूल जा , बस तयारी कर ले में कल तुझे लेने आरहा हु... शोभा के रूआसे गले से बड़ी मुश्किल से आवाज़ निकली 'बेटा मुझे तो पूरानी कोई बात याद नहीं, बहु केसी हे ? माँ वो भी ठीक है तुझे बहुत याद कर रही है, में कल तुझे लेने आरहा हु तू तैयार रहना, अच्छा माँ में अब फ़ोन रखता हु '
कुछ देर तो फ़ोन के रिसीवर को ही अपनी छाती से लगा के शोभा रोती रही फिर वार्डेन के सँभालने पर आंसू पोचती हुई बोली मेडम मेरा बेटा मुझे अपने साथ रखेगा वो मुझे लेने आने वाला हे . ये खबर आश्रम में फैलते ही शोभा को बधाई देने सारा आश्रम पहुच गया.
आखिर भगवान ने शोभा की सुन ही ली और उसके बेटे में बदलाव ला दिया .
दस दिन पहले :
बधाई हो mr कुमार आप बाप बनने वाले है, 'Thank you डॉक्टर' कहते हुए कुमार ने शरारत भरी मुस्कान से सपना की तरफ देखा
डॉक्टर: लेकिन कुमार अब तुम्हे सपना का बहुत ध्यान रखना पड़ेगा क्युकी ये बहुत क्रिटिकल केस हे ऐसे केसों में ज़रा सी लापरवाही माँ और बच्चे के लिए जान लेवा हो सकती है , सबसे पहले तो तुम सपना को ऑफिस से छुट्टी दिलाओ और फिर एक आया का इंतज़ाम करो जो इसकी सुबह शाम देखभाल करे .
कुमार: लेकिन डॉक्टर आप तो जानते है इस शहर में आया मिलना कितना मुश्किल है और जो मिलती है वो बहुत ज़यादा पैसा मांगती है
फिर कुछ सोचते हुए कुमार ने सपना की तरफ मुस्कुराते हुए देखा और बोला 'ओके डॉक्टर आया का इंतज़ाम हो जायेगा'....

Wednesday, October 8, 2008

"कब्रखोदु"

कब्ररुस्तान की दीवार से लगी हुई झोपडी की चोखट पे बेठी सकीना बेचेनी से अपना फटा हूआ दुपट्टा दातो से चबा रही थी , फिक्र वही रोज वाली ‘आज भी कोई मरा या नही, गुलाम आज भी कुछ कमा के लायेगा या नही’.  
 2 दिन बचे हे ईद मे ओर कही आज रात ही चांद दिख गया तो फिर कल ही हो जाएगी ईद.  

सकीना लग भग 23-24-साल की ओरत सावला रंग बदन पे गेह्ररे पीले रंग का मेला सलवार कुर्ता आठ बरस हो गये थे उसकी शादी को इन आठ सालो मे गुलाम ने सिर्फ 2 जोड कपडे ही दिलाए थे.बाकी अब्बा ने दहेज़ मे जो कपडे दिये थे उन से ही काम चला इतने बरस. आखिर क्यु न देते कानपुर शहर के खानदानी कब्रखोदु जो थे, कब्रखोदु खानदान की वजह से ही तो ग़ुलाम को उन्होने पसन्द किया था वरना था ही क्या गुलाम के पास, वेसे दिल का बहुत नेक बन्दा है गुलाम 30-32 साल का छोटा कद गथीला बदन रंग् ऐसा के अमावस की रात भी शरमा जाये मिरज़ापुर कसबे के कब्रुस्तान मे बाप दादा के वक़्त से कब्रे खोदते आ रहे है .वेसे उसका ऐक छोटा भाई भी है लल्लन लेकिन वो नालायक अपने पुरखो का काम छोड के कानपुर शहर के बाहर पंचर की दुकान खोल के बेठा है .
 

पेहले तो गुलाम की कमाई मे उसका ओर सकीना का पुरा हो जाता था लेकिन दो से तीन हुए परवीन पेदा हुई फिर तीन से चार मजीद हुआ चार से पांच  नसीम हुआ ओर बची कुची कसर देड साल पहले छुटटन ने पूरी कर दी , आखिर पुरा हो तो कहा से हो कमाने वाला ऐक ओर खाने वाले 6 . ओर फिर आज कल जेसे लोगों के घरो मे मैयत होना ही बन्द हो गया हो वरना ऐक वक़्त था हफते मे एक अदद मैयत आ ही जाती थी ओर फिर जब बिमारियो का आना होता तो हफ्ते मे 5-6 मैयत आम बात थी , वो भी क्या दिन थे बाजार से तदुरी मुर्गा ओर मोगरे का गजरा कितने प्यार से लाता था गुलाम, हाये अब तो बस यादे ही रह गई हे , नास मिटे इन डाक्टरो का पता नही कोन सी दवाई पिला देते हे , इन की वजह से लोगो का मरना कम हो गया हे.
ऐक तो मनहुसो ने हर गली नुक्कड पे दुकाने खोल ली हे , मरीज़ कम डाकटर ज़्यादा ओर बाकी जो मर रहे हे उनके पास कुछ देने को न होता, चंदा करके तो कफन का इनतेज़ाम होता हे.


.4 मुठ्ठी चावल जो बचे थे वो भी कल रात खतम हो गये, 2 दिन से बच्चो को आधा पेट खिला रही हे  यह बोल के, के कल ज़यादा मिलेग आज सुबह भी बहाना बना दिया के आज के दिन घर मे चूलह नही जलता, परवीन सयानी हो गैइ हे सब समझ्ती हे लेकिन बाकी को समझाना बड़ा मुशकिल होता हे कई बार तो पिटाई लगा के सुलाना पड़ता हे , बुरा तो बहुत लगता हे पर क्या करे.

गुलाम बेचारा तो सुबह से ही कब्रुस्तान के दरवाजे पे बेठ जाता हे ओर शाम को मायुस हो के लोट आता हे, कल रात तो उसने कुछ भी नही खाया पानी से रोज़ा खोल के ही सो गया बोला मेरे हिस्से का भी बच्चो को दे दे , अब उसे क्या मलूम के कितना था सकीना ने भी कहा खया था.
वेसे कब्रखोदु होना भी किसी बददुआ से कम न था अगर वो कोइ दुसरा काम करना भी चाहे तो भी कोइ नही देगा आखिर कब्र जो खोदता हे. गुलाम ने भी कई बार कोशिश की के कोइ कम से कम मज़दुरी का काम ही देदे लेकिन हर बार उसे शरमिंदा होके मयूस लोटना पडा . 


इधर बच्चो ने उसका जीना हराम कर दिया था रोज़ ऐक ही सवाल अब्बा ईद के कपड़े कब दिलाओ गे , बच्चे तो बच्चे हे उन्हे कोन सम्झाए के अभी तो खाने के लाले पडे हे कपड़े कहा से आयेंगे .
पिछ्ले बरस तो रमज़ान से पेहले ही 3 कब्रे खुद गई थी तो रमज़ान ओर ईद दोनो मज़े से गुज़रे थे. 

इस बरस न जाने क्या मनहुसियत लगी हुइ हे , पिछ्ले 2 महीने से तो मिरज़ापुर मे इंसान तो क्या चिडिया का बच्चा भी न मरा था. 

लोग मरते रहे कब्रे खुदती रहे तो कब्रुस्तान मे चेहल पेहल बनी रेह्ती हे वरना तो सन्नाटे ही सन्नाटे , जो हाल कब्रुस्तान का था वो ही हाल शमशान का थ धुआ उठे कितने दिन हो गये थे.आज गुलाम को लग रहा था के शायद लल्लन ने ठीक ही किया जो धन्दा बदल लिया कम से कम किसी के मरने का तो इनतेज़ार नही करता होगा .लेकिन फिर आखरी वक़्त की अब्बा की नसीह्त याद आ जाती हे के जो भी हालत हो अपना धन्धा मत छोड्ना.

 शाम होने को थी रोज़ा खोलने का वक़्त भी होने लगा था, आज तो घर मे कुछ भी न था रोज़ा खोलने के लिये , गुलाम को अपने रोज़ा खोलने से ज़यादा बच्चो ओर सकीना के खाने की फिक्र हो रही थी आखिर सकीना का भी तो रोज़ा था 

बेचेन हो के गुलाम टेहल्ने लगा ओर कब्रुस्तान के गेट के बाहर आ गया , कब्रुस्तान को आने वालि कच्ची सडक सुनी पडी हुई थी दूर से साईकल पे कोइ आता हुआ दिखा, करीब आया तो पता चला गफूर भाई का नोकर शब्बन हे, क्या हाल हे गुलाम ‘ केहते हुए शब्बन ने साईकल रोकी बस शब्बन मिया अल्लाह का करम हे, यहा केसे आना हुआ आज. ‘अरे अपने गफूर भाई माशाअल्लाह पुरे 75 के हो चले हे से इसी खुशी मे आज सारे  मिरज़ापुर मे इफ़तारी बटवा रहे हे, कुछ हिस्से बच गये थे सोचा तुम्हे भी देता चलु ‘ केह्ते हुए शब्बन ने बडे झोले मे से ऐक पिलासटिक की थेली निकाल के गुलाम को दे दी. थेली पकडते ही गुलाम के दिल को थोडा सुकून मिला वज़न से लग रहा था के आज के खाने का इंतेज़ाम हो गया. अरे गफूर भाई 75 के हो गये लेकिन लगते अभी भी जवान हे, अपने मालिक की तारीफ सुन के शब्बन का सीना चोडा हो गया’अरे क्यु न हो मियाँ बच्पन से आज तक अनाज से ज़्यादा मेवे जो खाये है तीसरी शादी की तय्यारी मे लगे हे आज कल , ईद के बाद इरादा हे , अच्छा अब चलु बहुत काम पडा हे ‘ केह्ते हुए शब्बन ने साईकल मोड ली, गुलाम ने भी अपनी झोपडी की तरफ रुख किया
 

झोपडी के किनारे बच्चे खेल रहे थे , गुलाम पे नज़र पड्ते ही ओर उसके हाथ मे थेली देखके बच्चे खुशी से चिल्लाने लगे’अब्बा खाना लाये , अब्बा खाना लाये ‘ 
बच्चो का शोर सुनके सकीना ने भी नज़र उठाई गुलाम पे नज़र पड्ते ही जान मे जान आई , लेकिन आज कोई कब्र तो खुदी नही फिर गुलाम क्या ला रहा हे ? .अभी गुलाम रास्ते मे ही था के बच्चे दोड लगा के उस्से झूम गये परवीन भी चुट्टन को गोद मे लेके पहुच गई , ‘अब्बा क्या खाना लाये हो ? नसीम ने थेली मे झाकते हुए पूछा 
हा बेटा चलो अन्दर चलो, 
सकीना को थेली देते हुए गुलाम ने गफूर भाई की शानो शोकत का वाक्या सुनाया सकीना ने उसकी बातो पे कम धयान देते हुए थेली को थाल मे उनडेला थेली के समान से गफूर भाई की अमीरी का अन्दाज़ा लगाया जा सकता था.
कई तरह के फल , खजूरे , नमकीन , पकोडे , पपड , समोसे येह सब देख के सकीना को सुकून मिला लेकिन सुकून थोडे वक़्त क ही था ‘ इन सब चीज़ो से आज का काम तो चल जयेगा लेकिन कल ‘ सोचते हुए सकीना ने थाल उठा के बीच मे रखा , गुलाम भी वज़ू कर के आ चुका था. ‘ सब लोग  थाल के आस पास बेठ गये, बच्चो से सब्र नही हो रहा था छुट्टन तो परवीन की गोद मे मच्चल्ने लगा , गुलाम ने ऐक अंगूर उठाके उस के मुह मे रख दिया . ‘ अब्बा वो लाल गेद जेसा क्या हे’ मजीद ने थाल मे घूरते हुए पूछा’ 
'सेब केह्ते हे इसे ‘ सकीना ने जवाब दिया.
तशले मे रखी कुछ चीज़े तो बच्चो ने पेहली बार ही देखी थी . जेसे सेब, अंगूर , अनार 

सब को बस गोला फूटने का इनतेज़ार था , नसीम बार बार एक ही बात पूछ रहा था ‘अब्बा नये कपडे लेने कब चलोगे ‘ , गुलाम ने इस बार उसे एसे घूरा के वो सहम के खामोश हो गया . थोडी देर मे गोला फूटा सब ने दुआ मांग के खाना शुरु किया गुलाम ने बस 4-5 खजूरे खाके पानी पी लिया सकीना ने कुछ ओर देना चाहा लेकिन गुलाम ने बच्चो की तरफ बडा दिया, ओर खुद नमाज़ पड्ने लगा. थोडी देर बाद सकीना भी उठ गई अब तशले पे परवीन का हुक्म था , नमाज़ पड्ने के बाद गुलाम झोपडी के बाहर आके बीडी पिने लगा सकीना भी उसके पास आके बेठ गई ओर गुलाम की माचिस से लालटेन जलाने लगी की तभी अनदर मजीद ओर नसीम झगडने लगे खाने को लेके छुट्टन भी रोने लगा बस फिर क्या था अपनी गरीबी का सारा गुस्सा गुलाम ने बच्चो पे उतार दिया शुरु से ले कर आखिर तक सब के 1-2 हाथ पडे , सकीना बहर ही बेठी रही सारे बच्चे रोते हुए उसके पास पहुच गये , गुलाम अन्दर ही लेट गया . 
 सकीना सबको दुलारने लगी

थोडी देर बाद कसबे से गोले छुट्ने की आवाज़े आने लगी सकीना समझ गई के ईद का चाँद दिख गया उसने आसमान की तरफ देखा , बहुत महीन सा चाँद ईद की खुशीया लिये दूर आसमान मे दिख रहा था लेकिन गुलाम ओर सकीना के लिये मयुसी से ज़यादा ओर कुछ न था. ‘ अम्मी अब्बा को पेसे नही मिले इसलिये गुस्सा हे ना’ परवीन ने मासुमियत से पुछा 
हा बेटा उनकी कमाई नही हुइ इसलिये मजीद बोला’ अम्मी अब्बा की कमाई क्यु नही हुई ‘ 
बेटा  कई दिन से कोई मरा ही नही हे , तुमहारे अब्बा को कब्र खोदने का काम नही मिला हे इसलिये उनकी कमाई नही हुई।

‘ तो अम्मा इस बार ईद पे हमे नये कपडे भी नही मिलेगे ‘ नसीम ने पूछा।
बेटा जब तक कोई मरेगा नही हमारे पास पेसे नही आयेंगे ओर जब पेसे नही होंगे तो ईद के कपडे भी नही आयेंगे एसे सवालो के जवाब देना सकीना को भी अजीब लग रहा था’ चलो अब तुम लोग चुप चाप बहर ही खेलो अब्बा अन्दर आराम कर रहे हे शोर मत करन मुझे भी नमाज़ पडनी हे ‘ कहते हुए लालटेन लेके सकीना भी अन्दर जाने लगी के नसीम ने उसका कुर्ता पकड के बोला ‘ अम्मी नमज़ मे आप अल्लह से केहना के जल्दी से किसी को मार दो ताकी अब्बा को पेसे मिले ओर वो हमे नये कपडे दिलवाये ‘ 
सकीना को समझ न आया के क्या कहे।
अन्दर गुलाम करवट लिये लेटा था ‘ सुनते हो ईद का चान्द दिख गया’ सकीना ने धीमी आवाज़ मे कहा पर गुलाम ने कोइ जवाब नही दिया लालटेन की धीमी रोशनी मे सकीना ने गुलाम के आंखो मे आंसु चमकते हुए देखा तो उसके करीब बेठ के प्यार से बोली ‘ परेशान न हो आप अल्लह ने चाहा तो अगली ईद हमारी भी अच्छे से गुज़रेगी ‘ ‘ केह के नमाज़ के लिये खडी हो गई।

नमाज़ खतम करके सकीना बिसतर लगा रही थी गुलाम की आंख लग चुकी थी बच्चे ने भी अन्दर आना शुरु कर दिया था के तभी झोपडी के बहर 2 लोग सईकल पे आये ‘अरे गुलाम कहा हो ’ , सकीना ने गुलाम को जगाया ‘ सुनो कोइ आपको बुलाने आया हे ‘ 
गुलाम ने बाहर आके देखा तो गफूर भाई का नोकर शबब्न एक ओर आदमी के साथ था ‘ अरे शब्बन भाई क्या हुआ सब खेरियत तो है ‘ गुलाम ने पुछा 

खेरियत नही हे मिया थोडी देर पेहले गफूर भाई का इंतेकाल हो गया जल्दी चलो उनके लिये कब्र खोदनी हे ‘ रोते हुए शब्बन ने कहा’ 
अरे लेकिन आखिर् हुआ क्या शाम तक तो तुमने कहा था तनदुरुस्त थे’ ?
अरे मत पूछो मिंया बड़ा बुरा वक़्त आ गया हे सुना हे पिछ्ले हफते जिस लडकी को देख के आये थे ,शादी के लिये शगुन मे लाख रुपे का हीरे का हार भी दे आये थे , आज खबर आइ के वो किसी ओर के साथ भाग गई बस अपने गफूर भाई बेचारे सदमा बरदाश्त न कर सके, चलो मिंया जल्दी करो बहुत काम बाकी हे ’ गुलाम ने अपना फावडा ओर तगडी उठाई ओर उनके साथ चल दिया .
गुलाम के जाते ही झोपडे मे फिर से बच्चो का शोर शुरु हो गया ’गफूर भाई मर गये नये कपडे आयेंगे , गफूर भाई मर गये नये कपडे आयेंगे, गफूर भाई मर गये नये कपडे आयेंगे ! 

Tuesday, July 15, 2008

इंसानियत.....आज की

बगेर नोक झोक के घर से काम के लिए निकलना अपने आप में एक बड़ा काम हे , जिस के साथ ऐसा हो वो समझता हे के आज उसने बहुत बड़ा तीर मार लिया। ऐसा ही कुछ उस दिन मेरे साथ हुआ , और शायद इसी वजह से एक लड़के पे मेहरबान होके उसे अपनी स्कूटर पे लिफ्ट दे बेठा ।लिफ्ट मांग के लूट और जेब कटी की वारदाते बड़ गई हे इस बात का ख्याल मुझे थोडी देर बाद आया, अब अगर उस लड़के को उतरने का कहता हु तो यह शिष्टाचार के खिलाफ होगा सो पूछ ही बेठा ' कहा तक जाना हे ' ।'बस अगले चोराहे पे उतर जाऊंगा भइया ' धीमी सी आवाज़ में उस लड़के ने जवाब दिया, बस फ़िर तो मुझे बड़ी बेसब्री से अगले चोराहे का इंतज़ार होने लगा के कब वो चोराहा आए और इस मुसीबत से मेरा पीछा छुटे । साइड गिलास में मेरे चेहरे पे चिंता और परेशानी के भाव साफ़ दिखाई पड़ रहे थे , और चोराहा था के आने का नाम नही ले रहा था , मन में आया के पिछली जेब में रखा अपना पर्स चेक कर लू, लेकिन फ़िर वही के लड़का क्या सोचेगा ,आखिर भगवन को मेरी परेशानी पे तरस आ ही गया ओर चोराहा आ गया , मेने झट से स्कूटर रोकी , लड़के ने स्कूटर से उतर के बड़ी विनर्मता के साथ हाथ जोड़ कर मुझे धन्यवाद कहा और तेज़ कदमो के साथ वहा से चल दिया, उसके जाते ही मेने झट से अपना पिछली जेब में रखा पर्स चेक किया, जेब पे हाथ लगते ही मेरे होश उड़ गए मेरा पर्स गायब था ,फिर क्या था बगेर किसी देरी के मेने चिल्लाना शरू कर दिया 'पकडो उस लड़के को पकडो मेरी जेब काट के भागा हे 'फ़िर क्या था हमारी आम जनता के लिए तो इतना डायलाग ही काफी होता हे , कुछ राहगीरों ने दोड़ लगाके उस लड़के को दबोच लिया , इससे पहले के वो कुछ समझ पाता , जनता ने उसपे हाथ साफ़ करना शुरू कर दिया , मेने भी २-३ हाथ जड़ दिए के तभी अचानक मेरे मोबाइल की घंटी बज उठी रिसीव किया तो दूसरी तरफ़ से मेरी माता श्री की आवाज़ आई ' आज कल ध्यान कहा रहता है अपना पर्स यही छोड़ गए '
मेरि समझ मे नहि आया के येह सब क्या हुआ
थोडी देर तक मे सोचता रहा ओर जब तक समझता जनता अपना काम कर चुकी थी , सडक किनारे बेहौशी की हालत मे वो लड्का पडा हूआ था , उसके मुह से खून बेह रहा था , कपडे फट गये थे , उसके टिफिन का सारा भोजन साडक पे बिखर गया था, यह देख के मुझे बोहत बुरा लगा , मुझे मेरी गलती पे पशतावा होने लगा ,मेने उसकी मदद करने का सौचा पर जेसे ही थोडा आगे कदम बडाया के फिर से मेरे मोबाईल कि घनटी बजी, काल सुना तो मेरे बास कि कड्कडाती हुई आवाज मेरे कान मे गई " क्या बात हे तुम ज़यादा काम वाले दिन हि कयु लेट होते हो, इस नौकरी से कया दिल भर गया हे क्या…? " येह सुनते ही मेरा सारा पश्चाताप छूमंतर हो गाया, मे वापस
तेज़ कदमो से अपनी स्कूटर की तरफ बडा, लेकिन फिर सोचा आखिर इस दुनिया मे इंसानियत भी कोइ चीज़ हे मे , मे वापस उस लड्के के पास गया , तब तक उसे होश आ चुका था उसकी आंखो मे आंसु थे , मेने हमदर्दी से उसके कन्धे पे हाथ रखा ओर धीमि सी आवाज मे कहा " सारी यार माफ कर देना" इससे पेहले के वो कुछ समझ पाता मेने स्कूटर स्टार्ट की ओर आगे बड गया.