Sunday, July 1, 2012
Miss U Maa....
Maa how r u, its five years I haven’t see u and babu ji … really missing u. Sapna also miss u a lot , mom pease come to me for few days , I m sending u rail ticket , ok Maa I m waiting for u Love u Maa
Call disconect .. Next call : Hello doctor, no need to arrange any expensive nurse for my wife, my mom is coming.
appoitment: अपोइन्टमेंट
मुरारी बाबू के कदमो की रफ़्तार अब और तेज़ हो गई थी पीछे आने वाले दोनों आदमियों ने भी अपनी रफ़्तार तेज़ कर दी थी मुरारी बाबू कुछ समझ नहीं पा रहे थे के आखिर ये गुंडे बदमाशों की तरह दिखने वाले आज ऑफिस से ही उनके पीछे क्यों है , वेसे कल भी ऑफिस ख़त्म होने के बाद उनकी नज़र इन दोनों आदमियों पे पड़ी थी, लेकिन सरकारी दफ्तर में तो लोगो का आना जाना लगा ही रहता है और वो भी रजिस्ट्री ऑफिस जेसा दफ्तर जहा रोजाना लाखो की रिशवत का आवन होता है , इसलिए वहा इन जेसे लोगो का होना आम बात है वेसे ओहदा तो मुरारी बाबू का भी कोई कम न था कई बार इन जेसे लोगो ने उन्हें लालच की पुडिया देने की कोशिश की थी लेकिन पिताजी की नसीहत का असर था या हिम्मत की कमी जो वो आज तक रिशवत की गंदगी से बचे हुए थे क्युकी भगवान की किरपा से घर का भरण पोषण तो उनकी पगार से ही हो जाता था , बड़ी बेटी की शादी हो ही चुकी थी बस अब बड़ा बेटा बिट्टू और छोटी बेटी गुडिया की शादी ही बची है , रिटायरमेंट में अभी 4-5 साल बाकि है और गुडिया को शादी के लिए अभी 2-3 साल है , बिट्टू की पढाई तो हो ही चुकी है हा बस काफी कोशिशो के बाद भी बेचारे को सरकारी नोकरी नहीं मिल पाई , पिछले 2 साल से प्राइवेट नोकरी कर रहा था फिर भी ठीक है कम से कम अपना खर्च तो चला ही लेता है अपनी नोकरी से . हा बस बेचारा अपनी दोस्त सपना से शादी नहीं कर पा रहा है , सपना के पिता को दामाद सरकारी नोकर ही चाहिए और वो क्यों न चाहे आखिर सपना उनकी इकलोती बेटी जो है और वो खुद भी 'ए क्लास अफसर जो है , इसीलिए तो उन्होंने बिट्टू को 1 साल का समय दिया था के वो इस एक साल में कोई सरकारी नोकरी हासिल कर ले या फिर सपना को भूल जाये . इन्ही सब खयालों में मुरारी बाबू कब सुनी सड़क तक आ गये उन्हें पता ही नहीं चला बस थोड़ी ही देर में घर भी आजायेगा , पीछे मुड के देखा तो वो बदमाश भी दिखाई नहीं दिए अब जाके उनकी जान में जान आई लेकिन घबराहट की वजह से पसीना रुकने का नाम नहीं ले रहा था, बार बार पीछे मुड के देख रहे थे के अचानक पेड़ की आड़ से दोनो बदमाश निकले एक बदमाश के हाथ में कुछ चमक रहा था मुरारी बाबू कुछ समझ पाते तब तक वो चमकदार चीज़ बड़े से छुरे के रूप में मुरारी बाबू के पेट में घुस चूका था एक के बाद एक कई वार करके दोनों बदमाश भाग निकले मुरारी बाबू बस एक चीख ही निकाल सके . अगले दिन मुरारी बाबू के क़त्ल की खबर पूरे शहर में फेल गई थी उनके मोहल्ले में तो सन्नाटा पसरा हुआ था , अंतिम यात्रा में सारा मोहल्ला और ऑफिस के सभी लोग शामिल हुए अगले दिन ऑफिस के बड़े बाबू मुरारी बाबू के घर आके उनकी विधवा से बोले " भाभी जी नियम के अनुसार मुरारी बाबू की अकस्मात् मृत्यु की वजह से उनकी नोकरी अब उनके लड़के को मिल सकती है , अगले सोमवार बिट्टू को उसके सारे सर्टिफिकेट लेके दफ्तर पंहुचा देना" भगवान् एक रास्ता बंद करता है तो दूसरा खोल देता है ये सोच के मुरारी बाबू की पत्नी के आँखों में आंसू आगये कुछ दिनों बाद रात के अँधेरे में गली के नुक्कड़ पे बिट्टू से मिलने २ आदमी आये एक ने बदमाशों सी कड़कड़ी आवाज़ में बिट्टू से बोला : तुम्हारा काम हो गया तुम्हे अपोटमेंट भी मिल गया है अब हमारे पैसे निकालो बिट्टू : अरे अपोटमेंट नहीं अपोइन्टमेंट और मेने आप लोगों को यहाँ आने को माना किया था न , बाकि के पैसे अपोइन्टमेंट लैटर मिलते ही में आपको दे दूंगा आदमी : देखो बिट्टू बाबू अपोटमेंट लैटर हम कुछ नहीं जानते तुम बस बाकि के पैसो का इंतज़ाम जल्दी कर लो अगर कोई चालाकी की
कोशिश की तो सबको पता चल जायेगा के सरकारी नोकरी के लालच में तुमने अपने पिता को ... बिट्टू उन दोनों की बात बीच में कटते हुए बोला 'बकवास बंद करो 4 दिन में तुम्हे तुम्हारे बाकि पैसे मिल जायेंगे, अब जाओ यहाँ से' ..
कोशिश की तो सबको पता चल जायेगा के सरकारी नोकरी के लालच में तुमने अपने पिता को ... बिट्टू उन दोनों की बात बीच में कटते हुए बोला 'बकवास बंद करो 4 दिन में तुम्हे तुम्हारे बाकि पैसे मिल जायेंगे, अब जाओ यहाँ से' ..
Wednesday, February 1, 2012
टिन्नी की कहानी ......
दो बहनों में एक थी वो
भोली सी मासूम
परियो की गुडिया के जेसी
नाम था उसका टिन्नी..
टिन्नी को बस ये लगता था
बडकी चलाती अपनी धाक
मम्मी पापा भी तो हर दम
देते थे बडकी का साथ
येही सोच के छोटी टिन्नी
हो जाती थी बहुत उदास....हो जाती थी बहुत उदास...
फिर हुआ यु इक बार
सर्द हवा ने टिन्नी को जब दिया बुखार
नींद उड़ी मम्मी पापा की
बडकी भी हो गई उदास
कई राते जगी थी सब ने टिन्नी के ही आस पास
तब जाके जाना टिन्नी ने
कितना सब करते है प्यार ...कितना सब करते है प्यार...
सोला का जब हुआ था सावन
मोसम ने भी बदली करवट
बडकी हो गई थी सायानी
टिन्नी का बाकि भोलापन
ऐसे में इक दिन अचानक
आया था इक राजकुमार
सब बातो से बेखबर दोनों
झूल रही सावन का झूला..
राजकुमार ने मम्मी पापा से
मांग लिया बडकी का हाथ
पार गया वो सात समंदर
बडकी को लेके अपने साथ
जाते जाते बडकी ने टिन्नी को यु गले लगाया
जेसे हो वो उसी का साया.... जेसे हो वो उसी का साया...
धीरे धीरे समय था गुज़रा
टिन्नी भी हो चली सियानी
अब वो भी करती थी अपने राजकुमार का इंतज़ार
मन में उसके इक डर था
नहीं मिलेगा उसको कोई राजकुमार...नहीं मिलेगा उसको कोई राजकुमार...
इक दिन ऐसे ही टिन्नी के पास आया इक जोगी
था वो बिलकुल मस्त मोला अपने मन का भोगी
जोगी वो मस्तान था
न कोई वारिस न सामान था
वो जोगी भी हुआ दीवाना
टिन्नी की मतवारी आँखों का
पर कुछ ऐसा था उसमे जो टिन्नी को था खूब लुभाता
अपनी मोहक बातो से वो टिन्नी को था खूब हसाता....टिन्नी को था खूब हसाता
चाँद की शीतल रात में इक बार
टिन्नी से वो मिलने आया
देख के उसकी मोहनी आँखे
टिन्नी को कुछ समझ न आया
हरयाली फूलो के उपर
टिन्नी को वो लेके आया
जोगी के मतवारे नेनो में
टिन्नी खो गई सब भुलाके...टिन्नी खो गई सब भुलाके
भोर ने अपना अंचल खोला
चिडियों ने जब शोर मचाया
आँख खुली टिन्नी की जब
खुद को इक जंगले में पाया
तभी किसी की आहट ने
टिन्नी का था धयान हटाया
सफ़ेद घोड़े पे आया कोई
था वो देश का राजकुमार..था वो देश का राजकुमार...
टिन्नी से वो यु बोला ,तुम ही तो हो मेरा प्यार,
टिन्नी के तो होश खो गए
'में केसे हो सकती हु इक राजकुमार का प्यार
फिर टिन्नी को बहो में भरके
घोड़े पर वो हुआ सवार
अगर जो पूछा राजकुमार ने 'तुम यहाँ केसे आई'
येही सोच के टिन्नी की दोनों आँखे थी भर आई
केसे बताये वो राजकुमार को उस कपटी जोगी की बात
जिसने करके मोहक बातें छोड़ दिया जंगले में लाके
राजकुमार ने फिर बोला
'इक जोगी महल में आया था
मेरा जीवन साथी यहाँ मिलेगा ऐसा मुझे बताया था'
टिन्नी को कुछ समझ न आया
था ये कोई सपना या उस जोगी की माया....उस जोगी की माया
दूर पहाड़ी पर से कोई
दोनों को था देख रहा
गोर से देखा टिन्नी ने
वो उस जोगी का चेहरा था
देख के उनकी सुन्दर जोड़ी
जोगी भी मुस्कुराया था
राजकुमार ने जब ढूंडा
वो कही नज़र न आया था....वो कही नज़र न आया था...
अब टिन्नी उस राजकुमार के राजमहल की रानी थी
छोटी प्यारी सी ये टिन्नी की कहानी थी ...टिन्नी की कहानी थी...
भोली सी मासूम
परियो की गुडिया के जेसी
नाम था उसका टिन्नी..
टिन्नी को बस ये लगता था
बडकी चलाती अपनी धाक
मम्मी पापा भी तो हर दम
देते थे बडकी का साथ
येही सोच के छोटी टिन्नी
हो जाती थी बहुत उदास....हो जाती थी बहुत उदास...
फिर हुआ यु इक बार
सर्द हवा ने टिन्नी को जब दिया बुखार
नींद उड़ी मम्मी पापा की
बडकी भी हो गई उदास
कई राते जगी थी सब ने टिन्नी के ही आस पास
तब जाके जाना टिन्नी ने
कितना सब करते है प्यार ...कितना सब करते है प्यार...
सोला का जब हुआ था सावन
मोसम ने भी बदली करवट
बडकी हो गई थी सायानी
टिन्नी का बाकि भोलापन
ऐसे में इक दिन अचानक
आया था इक राजकुमार
सब बातो से बेखबर दोनों
झूल रही सावन का झूला..
राजकुमार ने मम्मी पापा से
मांग लिया बडकी का हाथ
पार गया वो सात समंदर
बडकी को लेके अपने साथ
जाते जाते बडकी ने टिन्नी को यु गले लगाया
जेसे हो वो उसी का साया.... जेसे हो वो उसी का साया...
धीरे धीरे समय था गुज़रा
टिन्नी भी हो चली सियानी
अब वो भी करती थी अपने राजकुमार का इंतज़ार
मन में उसके इक डर था
नहीं मिलेगा उसको कोई राजकुमार...नहीं मिलेगा उसको कोई राजकुमार...
इक दिन ऐसे ही टिन्नी के पास आया इक जोगी
था वो बिलकुल मस्त मोला अपने मन का भोगी
जोगी वो मस्तान था
न कोई वारिस न सामान था
वो जोगी भी हुआ दीवाना
टिन्नी की मतवारी आँखों का
पर कुछ ऐसा था उसमे जो टिन्नी को था खूब लुभाता
अपनी मोहक बातो से वो टिन्नी को था खूब हसाता....टिन्नी को था खूब हसाता
चाँद की शीतल रात में इक बार
टिन्नी से वो मिलने आया
देख के उसकी मोहनी आँखे
टिन्नी को कुछ समझ न आया
हरयाली फूलो के उपर
टिन्नी को वो लेके आया
जोगी के मतवारे नेनो में
टिन्नी खो गई सब भुलाके...टिन्नी खो गई सब भुलाके
भोर ने अपना अंचल खोला
चिडियों ने जब शोर मचाया
आँख खुली टिन्नी की जब
खुद को इक जंगले में पाया
तभी किसी की आहट ने
टिन्नी का था धयान हटाया
सफ़ेद घोड़े पे आया कोई
था वो देश का राजकुमार..था वो देश का राजकुमार...
टिन्नी से वो यु बोला ,तुम ही तो हो मेरा प्यार,
टिन्नी के तो होश खो गए
'में केसे हो सकती हु इक राजकुमार का प्यार
फिर टिन्नी को बहो में भरके
घोड़े पर वो हुआ सवार
अगर जो पूछा राजकुमार ने 'तुम यहाँ केसे आई'
येही सोच के टिन्नी की दोनों आँखे थी भर आई
केसे बताये वो राजकुमार को उस कपटी जोगी की बात
जिसने करके मोहक बातें छोड़ दिया जंगले में लाके
राजकुमार ने फिर बोला
'इक जोगी महल में आया था
मेरा जीवन साथी यहाँ मिलेगा ऐसा मुझे बताया था'
टिन्नी को कुछ समझ न आया
था ये कोई सपना या उस जोगी की माया....उस जोगी की माया
दूर पहाड़ी पर से कोई
दोनों को था देख रहा
गोर से देखा टिन्नी ने
वो उस जोगी का चेहरा था
देख के उनकी सुन्दर जोड़ी
जोगी भी मुस्कुराया था
राजकुमार ने जब ढूंडा
वो कही नज़र न आया था....वो कही नज़र न आया था...
अब टिन्नी उस राजकुमार के राजमहल की रानी थी
छोटी प्यारी सी ये टिन्नी की कहानी थी ...टिन्नी की कहानी थी...
Saturday, January 1, 2011
आसमा....
अपनी ऊँचाई पे इतरा न ऐ आसमां
हमने बारिश में तुझे रोते हुए देखा हे
सुबह को तेरी अठखेलिय देखी हे
दोपहर में तुझे जलते हुए देखा हे
हर रोज़ तुझे इंसानों सा रंग बदलते देखा हे
पूनम का तेरा यौवन , अमावस में मुँह छुपाते देखा हे
बादलो से अनबन , बदली छटते तेरा अकड़ना देखा हे
हर रोज़ तुझे इंसानो सा रंग बदलते देखा हे
हमने बारिश में तुझे रोते हुए देखा हे
सुबह को तेरी अठखेलिय देखी हे
दोपहर में तुझे जलते हुए देखा हे
हर रोज़ तुझे इंसानों सा रंग बदलते देखा हे
पूनम का तेरा यौवन , अमावस में मुँह छुपाते देखा हे
बादलो से अनबन , बदली छटते तेरा अकड़ना देखा हे
हर रोज़ तुझे इंसानो सा रंग बदलते देखा हे
हमको मालूम हे हकीकत तेरी ऐ आसमा
हमने बारिश में तुझे रोते हुए देखा हे।।
Sunday, August 15, 2010
'चवन्नी'
दिवाली पे इतनी सर्दी शायद ही पहले कभी पड़ी हो . उस चुभने वाली सर्दी ने दिवाली का सारा मज़ा ही बिगड़ दिया था . हर साल की तरह इस साल भी तिब्बती लोग अपने गर्म ऊनी कपड़ो की दुकाने सजा चुके थे. जेसे जेसे सर्दी बड़ती थी इन तिबत्तियो के चेहरों में ख़ुशी बड़ती जाती थी. तिबत्तियो के साथ सामने के फूटपाथ पे रहने वाली बुडी भिखारन के लिए भी यह सुनेहरा मोका होता था , इन दुकानों की वजह से सड़क पे काफी भीड़ भाड़ रहती हे, वही बेठे बेठे ही उसके भीख का कोटा पूरा हो जाता था यहाँ वहा भटकने की ज़रुरत नहीं पड़ती थी.
लेकिन फिर भी उसके सर्दी से फटे हुए झुर्रीदार चेहरे पे गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था , वजह सिर्फ एक ही 'चवन्नी' .
वेसे बस्ती वाले और फुटपाथ पे से रोज़ गुजरने वाले चवन्नी को बुडिया की नाती पोती ही समझते थे लेकिन यह बात सिर्फ बुडिया ही जानती थी के चवन्नी से उसका कोई खून का रिश्ता नहीं हे बलकि वो तो कभी कभी उस मनहूस दिन को कोसती हे जिस दिन यह चवन्नी उसके गले पड़ गई थी.
उस रात को 5-6 साल हो चुके थे जिस दिन एक बड़ी सी गाड़ी से कोई लग भाग दो- तीन साल की बच्ची को सोती हुई हालत में फुटपाथ पे छोड़ गया था. सुबह लोगो की चहल पहल से बच्ची की नींद खुली तो उसने रोना शुरू कर दिया , अपनी बुडी आँखों से बुडिया ने सारा माजरा देखा था लेकिन उसे क्या जिसकी बला हो वो जाने, लेकिन बुडिया की चिंता तब बड़ी जब बच्ची ने बुडिया के झोपडे के सामने आके और तेज़ रोना शुरू करदिया. पहले तो बुडिया ने कई बार धुतकारा लेकिन फिर शायद वो भुखी हो यह जान के बासी पाव उसे दे दिया और खुद काम पे निकल गई .
शाम को जब बुडिया वापस लोटी तो देखा वो बच्ची उसी के झोपडे में सो रही थी, उसकी अध् खुली मुठ्ठी में एक चवन्नी नज़र आ रही थी , शायद किसी ने भीख में दी थी, बस उसी दिन से उसका नाम चवन्नी पड़ गया और वो बुडिया के गले पड़ गई .
वेसे बुडिया ने चवन्नी से छुटकारा पाने के लिए एडी चोटीi का जोर लगाया लेकिन उसकी सारी कोशिश नअकाम रही.
पंडू हवलदार को सारी कहानी सुनाई लेकिन उसके कान पे जू तक न रेंगी.
हिम्मत जुटा के कोतवाली पोहची तो बड़े साब ने यह कह के "हमारे पास बच्ची गुम होने की कोई रिपोट नहीं हे"
उसे धुत्कार के भगा दिया.
लल्लू पनवाडी ने बताया नए मोहल्ले में मंगत भाई नाम का एक आदमी आश्रम चलता हे सो वो उसके पास पहुच गई,मंगत भाई ने उसकी सारी कहानी सुनी और उसपे विशवास भी किया, मंगत भाई ने बड़े प्यार से बच्ची के सर पे हाथ फेरा और उसे गोर से देखा , बुडिया को एक सूती साडी भी दी नोकर को भेजके बुडिया के लिए चाय भी मंगवाई , सच मुच मंगत भाई बहुत भले इंसान हे सोचते हुए बुडिया ने चाय की चुसकिया ली, बरसात के मोसम में गरमा गर्म चाय की बात ही कुछ और थी , बच्ची बुडिया और मंगत भाई दोनों को अजीब नजरो रे देख रही थी , बुडिया ने उसपे एक नज़र डाली और और मंगत भाई का धन्यवाद करते हुए वहा से चल दी , बहार सड़क पे हलकी बूंदा बंदी शुरू हो गई थी , बुडिया ने एक बार फिर पलट के देखा तो आश्रम की गेलरी में से बच्ची उसी को देख रही थी , तभी अचानक बुडिया को याद आया के मंगत भाई ने जो साडी दी थी वो तो उसने आश्रम में ही छोड़ दी बिजली की तेरह बुडिया आश्रम की और बड़ी बारिश की वजह से अँधेरा हो गया था आश्रम की शायद बत्ती भी गुल हो गई थी , बुडिया की साडी वही राखी थी जहा वो बेठी थी बहार गेलरी में बच्ची बारिश की बुँदे देख रही थी मंगत भाई शायद अन्दर चले गए थे , साडी उठा के बुडिया वापस पलटी ही थी के उसके कानो में मंगत भाई की आवाज पड़ी, वो शायद किसी से टेलीफोन पे बात कर रहे थे " आज ही आई हे , शकल सूरत से अच्छे घर की लगती हे , नहीं नहीं तीस हज़ार से एक भी पैसा कम नहीं , मुझे क्या पता नहीं के तुम इसके कितने दाम बनाओगे"
फोन काटने के बाद मंगत भाई गेलरी में आये तो बच्ची गायब थी.
ऑटो रिक्शा बुडिया की झोपडी के सामने ही रुका , पेसे देने के बाद बुडिया बच्ची के साथ नीचे उतरी आज शायद जीवन में पहली बार बुडिया ऑटो रिक्शा में बेठी थी आखिर जल्द से जल्द मंगत भाई के आश्रम से दूर जो जाना था
बच्ची की तरफ देखा तो बुडिया को समझ नहीं आरहा था के वो क्या करे.
बुडिया फुटपाथ पे बने अपने झोपडे के सामने बेठ गई , बच्ची भी उसके पास बेठ गई , थोडी ही देर में बुडिया ने बच्ची को अपने साथ रखने का मन बना लिया , इस ह्रदय परिवर्तन का कारण था के लोग बच्ची को भी भीक देके जा रहे थे. धीरे धीरे चवन्नी के अन्दर वो सभी गुण आ गये जो एक भिखारन में होने चाहिए.
लेकिन आज सड़क पे इतनी आवक जावक हे मगर वो करमजली चवन्नी न जाने कहा मर गई, हरामखोर को रात भर भूखा रखूंगी तो सारी अकल ठिकाने आ जायेगी बुदिया बड़बडाये जा रही थी .
अभी अगर मेरे साथ होती तो न जाने कितनी भीख जमा हो जाती के रात को कलारी से अंग्रेजी का पव्वा और मद्रासी की बची हुई मछली.... सोच के बुडिया के पोपले मुह में पानी आगया लेकिन दुसरे ही पल जेसे ही उसकी नज़र लंगडे भिखारी पे पड़ी बुडिया तिलमिला उठी , चवन्नी के न होने की वजह से आज तो लंगडे को भी बहुत भीख मिल रही हे , आखिर बुडिया से बर्दाश्त न हुआ " ऐ लंगडे तुझे कितनी बार मना किया हे फुटपाथ के इस तरफ न आया कर , तेरी समझ में नहीं आता , दूसरी बार यहाँ दिखा तो दूसरी टांग भी तोड़ दूंगी " अपना डंडा हवा में उठा ते हुए बुडिया चिल्लाई , "जाता हु जाता हु ठठरी पे बेठी हे और बाते बड़ी बड़ी , कहा लेके जायेगी इतना माल " धीरे धीरे बडबडाते हुए लंगडा सड़क के दूसरी तरफ पहुच गया.
जेसे जेसे समय गुज़र रहा था सर्दी बढती जा रही थी . गर्मियों में रह रह कर बुडिया जिस सूरज को कोसती थी आज उसी को बार बार याद करके थोडी गर्मी महसूस कर रही थी. आज तो जलाने को भी कुछ न बचा था जो पुराने टायर थे वो तो कल रात ही जला दिए थे अब तो एक ही चारा था , चवन्नी आये तो उसे भेज के कुछ कचरा जमा किया जाये जलाने के लिए. एक तो सर्दी ने परेशान किया हे उपर से आज पहली बार इतनी देर के लिए चवन्नी गायब हुई थी.
चवन्नी के बारे में सोच सोच के आज बुडिया का मन भी भीक मांगने में नहीं लग रहा था. थोडी थोडी देर में वो बडबडाने लगती थी 'अच्चा हे निगोडी मर जाये तो पिंड छुटे.
शाम का समय हो रहा था रास्ते पे लोगो की आवक भी कम हो गई थी , सर्दी की वजह से आज नुक्कड़ का चाये वाला भी अपनी गुमठी जल्दी बंद कर गया था , कुछ दूर पे आतिशबाजी की दुकाने लगी हुई हे वह काफी भीड़ थी , आज दिवाली जो हे पर सर्दी की वजह से बुडिया की वहा जाने की हिम्मत न हो रही थी .
वेसे बुडिया को ठीक से याद तो नहीं पर 70-75 सावन तो देख ही चुकी थी पर इतनी सर्दी उसने आज तक न देखि थी .
पठाखे फूटने की आवाजे आना शुरू हो गई थी , शाम ढलने लगी थी , अब बुडिया को चवन्नी की ज़यादा चिंता होने लगी थी , आखिर उसने हिम्मत जुटा के चवन्नी को ढूँढने जाने का मन बना ही लिया , अपनी गठरी को बगल में दबाके, डंडा उठाके बुडिया अभी कुछ कदम ही चली थी के दूर से किसी को आता देख रुक गई और वापस अपनी झोपडे में आगई, एक ही पल में बुडिया के चेहरे से चिंता के भाव ख़त्म हो गए थे लेकिन गुस्सा बाद गया था.
लडखडाती चाल के साथ एक लड़की झोपडी की तरफ चली आरही थी , लगभग 8-९ साल की लड़की जिस्म पे एक पुरानी फटी हुई फ्राक और सलवार जिनका रंग पहचानना भी मुश्किल था सर पे एक कपडा ऐसे बंधा हुए था के दोनों कान छुप जाये सर्दी से बचने के लिए, पेरो में दो अलग तरह की चप्पल थी, चेहरे पे मासूमियत के साथ थकान साफ़ नज़र आरही थी उसकी चाल से ऐसा लग रहा था के पेरो में कोई ज़ख्म हो जिसकी वजह से चलने में दिक्कत हो रही थी. जेसे ही वो झोपडे के सामने पोहची सबसे पहले उसका सामना बुडिया की कडकडाती आवाज़ के साथ हुआ " कहा मरने गई थी हरामखोर, बाहर निकल जा आज के बाद अपनी मनहूस शकल मत दिखाना"
बुडिया की डाट और सर्दी की कपकपाहट के साथ चवन्नी के आंसू बहने लगे.
"अब कुछ बोलेगी भी या ज़बान बेच आई हे , बोल कहा मर रही थी और ये हाथ में क्या छुपा रही हे"
डर की वजह से चवन्नी ने हाथ आगे कर दिया उसके हाथ में एक दस का नोट था .
बुडिया फिर गरजी 'कहा से आया ये दस का नोट'
अपने आंसू पोछते हुए चवन्नी ने बताया 'अम्मा कल रात तुम सर्दी की वजह से बहुत ख़ास रही थी इसलिए में बस्ती में तुम्हारे किये गरम कपडा मांगने गई थी, मेने बहुत लोगो से माँगा पर किसी ने नहीं दिया , फिर जब में वापस आरही थी तो नुक्कड़ पे एक आदमी ने मुझसे पूछा क्या चाहिए मेने कहा गरम कपडा तो वो बोला मेरे साथ चलो में देता हु , वो मुझे बस्ती के पीछे एक घर में लेके गए रास्ते में उन्होंने मुझे एक चाकलेट भी दी ,
पर अम्मा वो बहुत खराब आदमी था, रोते हुए चवन्नी बोली , पता हे अम्मा उसने मेरी फ्राक ....... दिवाली के पठाखो की आवाज़ तेज़ हो गई , थोडी देर बाद पठाखो की आवाज़ धीमे हुई ...... बुडिया अपने झोपडे से बाहर निकल कर बस्ती की तरफ मुह करके गन्दी गालिया बकने लगी
लेकिन फिर भी उसके सर्दी से फटे हुए झुर्रीदार चेहरे पे गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था , वजह सिर्फ एक ही 'चवन्नी' .
वेसे बस्ती वाले और फुटपाथ पे से रोज़ गुजरने वाले चवन्नी को बुडिया की नाती पोती ही समझते थे लेकिन यह बात सिर्फ बुडिया ही जानती थी के चवन्नी से उसका कोई खून का रिश्ता नहीं हे बलकि वो तो कभी कभी उस मनहूस दिन को कोसती हे जिस दिन यह चवन्नी उसके गले पड़ गई थी.
उस रात को 5-6 साल हो चुके थे जिस दिन एक बड़ी सी गाड़ी से कोई लग भाग दो- तीन साल की बच्ची को सोती हुई हालत में फुटपाथ पे छोड़ गया था. सुबह लोगो की चहल पहल से बच्ची की नींद खुली तो उसने रोना शुरू कर दिया , अपनी बुडी आँखों से बुडिया ने सारा माजरा देखा था लेकिन उसे क्या जिसकी बला हो वो जाने, लेकिन बुडिया की चिंता तब बड़ी जब बच्ची ने बुडिया के झोपडे के सामने आके और तेज़ रोना शुरू करदिया. पहले तो बुडिया ने कई बार धुतकारा लेकिन फिर शायद वो भुखी हो यह जान के बासी पाव उसे दे दिया और खुद काम पे निकल गई .
शाम को जब बुडिया वापस लोटी तो देखा वो बच्ची उसी के झोपडे में सो रही थी, उसकी अध् खुली मुठ्ठी में एक चवन्नी नज़र आ रही थी , शायद किसी ने भीख में दी थी, बस उसी दिन से उसका नाम चवन्नी पड़ गया और वो बुडिया के गले पड़ गई .
वेसे बुडिया ने चवन्नी से छुटकारा पाने के लिए एडी चोटीi का जोर लगाया लेकिन उसकी सारी कोशिश नअकाम रही.
पंडू हवलदार को सारी कहानी सुनाई लेकिन उसके कान पे जू तक न रेंगी.
हिम्मत जुटा के कोतवाली पोहची तो बड़े साब ने यह कह के "हमारे पास बच्ची गुम होने की कोई रिपोट नहीं हे"
उसे धुत्कार के भगा दिया.
लल्लू पनवाडी ने बताया नए मोहल्ले में मंगत भाई नाम का एक आदमी आश्रम चलता हे सो वो उसके पास पहुच गई,मंगत भाई ने उसकी सारी कहानी सुनी और उसपे विशवास भी किया, मंगत भाई ने बड़े प्यार से बच्ची के सर पे हाथ फेरा और उसे गोर से देखा , बुडिया को एक सूती साडी भी दी नोकर को भेजके बुडिया के लिए चाय भी मंगवाई , सच मुच मंगत भाई बहुत भले इंसान हे सोचते हुए बुडिया ने चाय की चुसकिया ली, बरसात के मोसम में गरमा गर्म चाय की बात ही कुछ और थी , बच्ची बुडिया और मंगत भाई दोनों को अजीब नजरो रे देख रही थी , बुडिया ने उसपे एक नज़र डाली और और मंगत भाई का धन्यवाद करते हुए वहा से चल दी , बहार सड़क पे हलकी बूंदा बंदी शुरू हो गई थी , बुडिया ने एक बार फिर पलट के देखा तो आश्रम की गेलरी में से बच्ची उसी को देख रही थी , तभी अचानक बुडिया को याद आया के मंगत भाई ने जो साडी दी थी वो तो उसने आश्रम में ही छोड़ दी बिजली की तेरह बुडिया आश्रम की और बड़ी बारिश की वजह से अँधेरा हो गया था आश्रम की शायद बत्ती भी गुल हो गई थी , बुडिया की साडी वही राखी थी जहा वो बेठी थी बहार गेलरी में बच्ची बारिश की बुँदे देख रही थी मंगत भाई शायद अन्दर चले गए थे , साडी उठा के बुडिया वापस पलटी ही थी के उसके कानो में मंगत भाई की आवाज पड़ी, वो शायद किसी से टेलीफोन पे बात कर रहे थे " आज ही आई हे , शकल सूरत से अच्छे घर की लगती हे , नहीं नहीं तीस हज़ार से एक भी पैसा कम नहीं , मुझे क्या पता नहीं के तुम इसके कितने दाम बनाओगे"
फोन काटने के बाद मंगत भाई गेलरी में आये तो बच्ची गायब थी.
ऑटो रिक्शा बुडिया की झोपडी के सामने ही रुका , पेसे देने के बाद बुडिया बच्ची के साथ नीचे उतरी आज शायद जीवन में पहली बार बुडिया ऑटो रिक्शा में बेठी थी आखिर जल्द से जल्द मंगत भाई के आश्रम से दूर जो जाना था
बच्ची की तरफ देखा तो बुडिया को समझ नहीं आरहा था के वो क्या करे.
बुडिया फुटपाथ पे बने अपने झोपडे के सामने बेठ गई , बच्ची भी उसके पास बेठ गई , थोडी ही देर में बुडिया ने बच्ची को अपने साथ रखने का मन बना लिया , इस ह्रदय परिवर्तन का कारण था के लोग बच्ची को भी भीक देके जा रहे थे. धीरे धीरे चवन्नी के अन्दर वो सभी गुण आ गये जो एक भिखारन में होने चाहिए.
लेकिन आज सड़क पे इतनी आवक जावक हे मगर वो करमजली चवन्नी न जाने कहा मर गई, हरामखोर को रात भर भूखा रखूंगी तो सारी अकल ठिकाने आ जायेगी बुदिया बड़बडाये जा रही थी .
अभी अगर मेरे साथ होती तो न जाने कितनी भीख जमा हो जाती के रात को कलारी से अंग्रेजी का पव्वा और मद्रासी की बची हुई मछली.... सोच के बुडिया के पोपले मुह में पानी आगया लेकिन दुसरे ही पल जेसे ही उसकी नज़र लंगडे भिखारी पे पड़ी बुडिया तिलमिला उठी , चवन्नी के न होने की वजह से आज तो लंगडे को भी बहुत भीख मिल रही हे , आखिर बुडिया से बर्दाश्त न हुआ " ऐ लंगडे तुझे कितनी बार मना किया हे फुटपाथ के इस तरफ न आया कर , तेरी समझ में नहीं आता , दूसरी बार यहाँ दिखा तो दूसरी टांग भी तोड़ दूंगी " अपना डंडा हवा में उठा ते हुए बुडिया चिल्लाई , "जाता हु जाता हु ठठरी पे बेठी हे और बाते बड़ी बड़ी , कहा लेके जायेगी इतना माल " धीरे धीरे बडबडाते हुए लंगडा सड़क के दूसरी तरफ पहुच गया.
जेसे जेसे समय गुज़र रहा था सर्दी बढती जा रही थी . गर्मियों में रह रह कर बुडिया जिस सूरज को कोसती थी आज उसी को बार बार याद करके थोडी गर्मी महसूस कर रही थी. आज तो जलाने को भी कुछ न बचा था जो पुराने टायर थे वो तो कल रात ही जला दिए थे अब तो एक ही चारा था , चवन्नी आये तो उसे भेज के कुछ कचरा जमा किया जाये जलाने के लिए. एक तो सर्दी ने परेशान किया हे उपर से आज पहली बार इतनी देर के लिए चवन्नी गायब हुई थी.
चवन्नी के बारे में सोच सोच के आज बुडिया का मन भी भीक मांगने में नहीं लग रहा था. थोडी थोडी देर में वो बडबडाने लगती थी 'अच्चा हे निगोडी मर जाये तो पिंड छुटे.
शाम का समय हो रहा था रास्ते पे लोगो की आवक भी कम हो गई थी , सर्दी की वजह से आज नुक्कड़ का चाये वाला भी अपनी गुमठी जल्दी बंद कर गया था , कुछ दूर पे आतिशबाजी की दुकाने लगी हुई हे वह काफी भीड़ थी , आज दिवाली जो हे पर सर्दी की वजह से बुडिया की वहा जाने की हिम्मत न हो रही थी .
वेसे बुडिया को ठीक से याद तो नहीं पर 70-75 सावन तो देख ही चुकी थी पर इतनी सर्दी उसने आज तक न देखि थी .
पठाखे फूटने की आवाजे आना शुरू हो गई थी , शाम ढलने लगी थी , अब बुडिया को चवन्नी की ज़यादा चिंता होने लगी थी , आखिर उसने हिम्मत जुटा के चवन्नी को ढूँढने जाने का मन बना ही लिया , अपनी गठरी को बगल में दबाके, डंडा उठाके बुडिया अभी कुछ कदम ही चली थी के दूर से किसी को आता देख रुक गई और वापस अपनी झोपडे में आगई, एक ही पल में बुडिया के चेहरे से चिंता के भाव ख़त्म हो गए थे लेकिन गुस्सा बाद गया था.
लडखडाती चाल के साथ एक लड़की झोपडी की तरफ चली आरही थी , लगभग 8-९ साल की लड़की जिस्म पे एक पुरानी फटी हुई फ्राक और सलवार जिनका रंग पहचानना भी मुश्किल था सर पे एक कपडा ऐसे बंधा हुए था के दोनों कान छुप जाये सर्दी से बचने के लिए, पेरो में दो अलग तरह की चप्पल थी, चेहरे पे मासूमियत के साथ थकान साफ़ नज़र आरही थी उसकी चाल से ऐसा लग रहा था के पेरो में कोई ज़ख्म हो जिसकी वजह से चलने में दिक्कत हो रही थी. जेसे ही वो झोपडे के सामने पोहची सबसे पहले उसका सामना बुडिया की कडकडाती आवाज़ के साथ हुआ " कहा मरने गई थी हरामखोर, बाहर निकल जा आज के बाद अपनी मनहूस शकल मत दिखाना"
बुडिया की डाट और सर्दी की कपकपाहट के साथ चवन्नी के आंसू बहने लगे.
"अब कुछ बोलेगी भी या ज़बान बेच आई हे , बोल कहा मर रही थी और ये हाथ में क्या छुपा रही हे"
डर की वजह से चवन्नी ने हाथ आगे कर दिया उसके हाथ में एक दस का नोट था .
बुडिया फिर गरजी 'कहा से आया ये दस का नोट'
अपने आंसू पोछते हुए चवन्नी ने बताया 'अम्मा कल रात तुम सर्दी की वजह से बहुत ख़ास रही थी इसलिए में बस्ती में तुम्हारे किये गरम कपडा मांगने गई थी, मेने बहुत लोगो से माँगा पर किसी ने नहीं दिया , फिर जब में वापस आरही थी तो नुक्कड़ पे एक आदमी ने मुझसे पूछा क्या चाहिए मेने कहा गरम कपडा तो वो बोला मेरे साथ चलो में देता हु , वो मुझे बस्ती के पीछे एक घर में लेके गए रास्ते में उन्होंने मुझे एक चाकलेट भी दी ,
पर अम्मा वो बहुत खराब आदमी था, रोते हुए चवन्नी बोली , पता हे अम्मा उसने मेरी फ्राक ....... दिवाली के पठाखो की आवाज़ तेज़ हो गई , थोडी देर बाद पठाखो की आवाज़ धीमे हुई ...... बुडिया अपने झोपडे से बाहर निकल कर बस्ती की तरफ मुह करके गन्दी गालिया बकने लगी
बदलाव :
बदलाव
वृद्ध आश्रम की वार्डेन ने तेज आवाज़ लगाई "शोभा दीदी जल्दी आओ आपके बेटे का फ़ोन आया है" शोभा को तो अपने कानो पे विश्वास ही नहीं हो रहा था के उसका बेटा उसे कभी फ़ोन भी कर सकता है . पति के स्वर्गवास के बाद कुछ दिन तो सब ठीक चला लेकिन फिर बेटा कुमार पुश्तेनी मकान अपने नाम करने की जिद्द करने लगा सो शोभा ने वो भी कर दिया बस थोड़े ही दिन में सब बदल गया इकलोता बेटा और बहु के व्यवहार में बहुत बदलाव आ गया , अब छोटी छोटी बातो के लिए उसे अपने बेटे और बहु की डाट सुन्नी पड़ती फिर कुछ समय बाद बहु ने बेटे को वृद्ध आश्रम का पता बता दिया और तब से शोभा ने इस आश्रम को ही अपना संसार बना लिया था पहले साल तो एक बार बेटा विदेश जाने से पहले मिलने भी आया था लेकिन पिछले पांच सालो से उसने कोई खबर ही नहीं ली थी.
बेटे के फ़ोन आने की ख़ुशी ने उसे मानो पागल सा कर दिया था नंगे पैर ही भागती हुई वार्डेन के कमरे पे पहुची और झट से फ़ोन उठा लिया 'हेल्लो' हेल्लो माँ में कुमार बोल रहा हु , केसी हो तुम ! सालो बाद बेटे की आवाज़ कान में पड़ते ही आँखों से आंसुओ की लड़ी बहने लगी
'में ठीक हु तू केसा है ' में भी ठीक हु माँ , माँ में और सपना चाहते हे की अब तू हमारे साथ ही रहे , हमें तेरी बहुत चिंता होती हे , तू सारी पुरानी बाते भूल जा , बस तयारी कर ले में कल तुझे लेने आरहा हु... शोभा के रूआसे गले से बड़ी मुश्किल से आवाज़ निकली 'बेटा मुझे तो पूरानी कोई बात याद नहीं, बहु केसी हे ? माँ वो भी ठीक है तुझे बहुत याद कर रही है, में कल तुझे लेने आरहा हु तू तैयार रहना, अच्छा माँ में अब फ़ोन रखता हु '
कुछ देर तो फ़ोन के रिसीवर को ही अपनी छाती से लगा के शोभा रोती रही फिर वार्डेन के सँभालने पर आंसू पोचती हुई बोली मेडम मेरा बेटा मुझे अपने साथ रखेगा वो मुझे लेने आने वाला हे . ये खबर आश्रम में फैलते ही शोभा को बधाई देने सारा आश्रम पहुच गया.
आखिर भगवान ने शोभा की सुन ही ली और उसके बेटे में बदलाव ला दिया .
दस दिन पहले :
बधाई हो mr कुमार आप बाप बनने वाले है, 'Thank you डॉक्टर' कहते हुए कुमार ने शरारत भरी मुस्कान से सपना की तरफ देखा
डॉक्टर: लेकिन कुमार अब तुम्हे सपना का बहुत ध्यान रखना पड़ेगा क्युकी ये बहुत क्रिटिकल केस हे ऐसे केसों में ज़रा सी लापरवाही माँ और बच्चे के लिए जान लेवा हो सकती है , सबसे पहले तो तुम सपना को ऑफिस से छुट्टी दिलाओ और फिर एक आया का इंतज़ाम करो जो इसकी सुबह शाम देखभाल करे .
कुमार: लेकिन डॉक्टर आप तो जानते है इस शहर में आया मिलना कितना मुश्किल है और जो मिलती है वो बहुत ज़यादा पैसा मांगती है
फिर कुछ सोचते हुए कुमार ने सपना की तरफ मुस्कुराते हुए देखा और बोला 'ओके डॉक्टर आया का इंतज़ाम हो जायेगा'....
Friday, October 16, 2009
DIWALI : The Victory of Light over Darkness

Well friends today I tried to bring some information related to Diwali because there are many peoples who don’t know the reason behind celebration of this great Indian festival :
India is a multi religious country, every year we enjoy lots of festivals belonging to different religions. These religions symbolize unity in diversity.
Dussehra, Diwali, Eid, Holi, Christmas all have their own unique style of celebration. Among the Hindu festivals Diwali the festival of light is the most popular.
It is celebrated with fervor and gaiety among all races and religions. Although the festival seasons start from Dussehra which falls 20 days before Diwali, during the Hindu month of Ashvin.
According to legend, Shri Ram killed the demon king of lanka, Ravana.
Shree Ram prayed to ‘Devi Durga’ the Goddess of war and on 10th day of the battle, Shri Ram killed Ravana and it is for this reason that Dassehra is also called ‘Vijaydashmi’.
After 20 days of Dassehra, Diwali is celebrated in the Hindu month of Kartik (around Oct-Nov) on amavasya. Hindus all over the world celebrate the festival with great enthusiasm.
Diwali symbolize the victory of Light over Darkness, it is a mark of triumph of good over evil. This day is devoted to Goddess Lakshmi as it is believed that she pays each house a visit on this day. People hold Lakshmi pujan in their homes.
Diwali is also the festival of sweets and feasting. In the evening diyas(earthen lamp) and candles are placed all around the house after witch the entire family assembles for puja.
A big diya is lit and later taken around light all the candles and diyas. Every town, village and the sky is lit with thousands of crakers bursting and diffusing colors in the sky.
Traditionally this day marks the commencement of the new financial year. It is a very special day for the business community, many business deals are finalized around this time, employer give diwali bonus and other gifts to their staff.
There are some negative sides of this festival too. Some people indulge in gambling on the day of Diwali because it is believed that the wife of Lord Shiva, Goddess Parvati, played a dice game with him on this day and therefore, those who gamble on this auspicious day are blessed with prosperity.
The celebration of this five day festival commences on Ashayuja bahula chaturdashi and ends on Kartika shudda vijaya.
The first day of this festival begins with dhan trayodashi or dhanteras. According to the scriptures Lord Dhanvantari who is also an incarnation of Lord Vishnu came out of the ocean that was churned by the Devtas and Rakshas on the day of Dhanteras. He appeared with ‘Ayurveda ‘for the welfare of mankind.
After Dhanteras the second day of Diwali is ‘Narak Chaturdashi’ It is popular also as choti Diwali. Narak Chaturdashi is related to the demon king ‘Narkasur’ who was the ruler of ‘Pragjyotishpur’ a province near Himalaya. Once Narkasur defeated Lord Indra during a war and snatched away the megnificient earring of Goddess Aditi, who was the ruler of Suryalok and also a relative of Lord Krishna’s wife Satyabhama. By the help of Lord Krishna Satyabhama defeated Narkasur and released all women and saints who were imprisoned by Narkasur in his palace. Satyabhama also restored the megnificient earring of Goddess Aditi.
The third day of Diwali also called Badi Diwali, The main day of celebration. Behind the celebration of Diwali there are many stories. The famous one is that Sri Ram, The seventh incarnation of Lord Vishnu and the eldest son of king of Ayodhya, Dashrath. Sri Ram took birth to free the earth from the cruelty and sin of ten-headed demon king of Lanka Ravana.
The forth day of Diwali is devoted to Govardhan puja (worship of Mount.Govardhan)
According to Vishnu Puran the people of gokul and Brij use to offer prayer to Lord Indra because they believe he was Indra who sent rains for them but Lord Krishna told them it was govardhan parvat and not Lord Indra who caused rains for them so first they should worship Govardhan Parvat and then Lord Indra so the people did the same but it made Indra furious resulting in heavy rains at Gokul ; than Lord Krishna came forward to save the people and lifted Govardhan Parvat as an umbrella on the little finger of his right hand for everyone to take shelter under it. After this incidence Lord Krishna also called Girdhari and Govardhan Dhari.
The fifth day of Diwali is Bhai Dooj also called ‘Yamdwitiya’ because Yamraj the God of death visited his sister ‘Yamuna’ on this day, the day ‘Shukla Paksh Dwitiya’ in the month of kartik.
Diwali is also an important day in Sikh community because the sixth guru ‘Guru Hargovind Ji’ came back from the captivity of Gwalior fort; people lighted lamps in his way to welcome him.
The day of Diwali is also very important for Jain community; Lord Mahaveer attained Nirvana or Moksha this day.
The Jain businesspeople traditionally started their accounting year from Diwali. They take it as a good omen.
Subscribe to:
Posts (Atom)

